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नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
एक ये चाँद-नगर का बासी जिस से दूर रहा संजोग
वर्ना इस दुनिया में सब ने चाहा चाँद और पाया चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़
नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की