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नज़्म
नहीं मुमकिन मिटाना मुझ को मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा यारो
ख़लाओं में रहूँगा गूँजता बन कर सदा यारो
सदा अम्बालवी
नज़्म
क़ल्ब-ए-आहन जिस के नक़्श-ए-पा से होता है रक़ीक़
शो'ला-ख़ू झोंकों का हमदम तेज़ किरनों का रफ़ीक़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
चराग़ों को जला देता है बढ़ कर डूबता सूरज
ज़मीं पर छोड़ता जाता है अपने नक़्श-ए-पा सूरज