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नज़्म
तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना
और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना
परवीन शाकिर
नज़्म
हर नस्ल इक फ़स्ल है धरती की आज उगती है कल कटती है
जीवन वो महँगी मदिरा है जो क़तरा क़तरा बटती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
जौन एलिया
नज़्म
ग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरे
तू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं