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नज़्म
फिर इस के ब'अद तो बस इक सुकूत-ए-मुस्तक़िल होगा
न कोई सुर्ख़-रू होगा, न कोई मुन्फ़इल होगा
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
निगाह-ए-बद से देखा है किसी ने गर गुलिस्ताँ को
तो गुल-ची की हर इक साज़िश हमीं को साज़गार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
यही वो मंज़िल-ए-मक़्सूद है कि जिस के लिए
बड़े ही अज़्म से अपने सफ़र पे निकले थे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
हम पे रहती है निगाह-ए-शफ़क़त-ए-अहल-ए-नज़र
महफ़िल-ए-शेर-ओ-अदब में जाने-पहचाने हैं हम