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नज़्म
किसी ने निकहत-ए-ज़ुल्फ़-परेशाँ का नहीं पूछा
किसी ने दुख के अंदर रौशनी की छब नहीं देखी
अब्बास ताबिश
नज़्म
मैं शाइ'र हूँ मुझे अहल-ए-हुनर फ़नकार कहते हैं
मुझे रम्ज़-आश्ना-ए-निकहत-ए-गुलज़ार कहते हैं
असद जाफ़री
नज़्म
मिरे बाज़ू पे जब वो ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ खोल देती थी
ज़माना निकहत-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं में डूब जाता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
निकहत-ए-गेसू को तेरी निकहत-ए-सुम्बुल लिखूँ
तेरे नर्म-ओ-नाज़ुक इन होंटों को बर्ग-ए-गुल लिखूँ
जय राज सिंह झाला
नज़्म
राह दुश्वार में इक क़ाफ़िला-ए-निकहत-ओ-नूर
संग-ए-ख़ारा की चटानों के मुक़ाबिल है खड़ा
अंजुम आज़मी
नज़्म
अलावों के क़रीं आने का इक प्यारा बहाना था
वो रक़्स-ए-निकहत-ए-गुल था कि गर्दिश में ज़माना था
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
जिन का दिल ढूँढता है गोशा-ए-ख़लवत का सुकूँ
सूरत-ए-निकहत-ए-गुल उन को परेशाँ कर दे
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
अलावों के क़रीं आने का इक प्यारा बहाना था
वो रक़्स-ए-निकहत-ए-गुल था कि गर्दिश में ज़माना था