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नज़्म
अर्ज़-ए-मतलब से झिजक जाना नहीं ज़ेबा तुझे
नेक है निय्यत अगर तेरी तो क्या पर्वा तुझे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में बहारें छुपी हुई
इक कारवान-ए-निकहत-ए-बुसताँ लिए हुए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जो नीयत के फ़ुतूर को हुस्न-ए-ख़याल में
और नतीजे की अज़िय्यत को हुस्न-ए-अमल में बदल दे
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
मस्जिदें भी हैं मनादिर भी हैं गिरिजा-घर भी
निकहत-ओ-नूर में डूबा हुआ हर मंज़र भी