aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "numaa.ish-gah-e-aalam"
ये तमाशा-गह-ए-आलम क्या है
ऐ तमाशा-गाह-ए-आलम रोए तूमाह-ए-नौ
शहर आराइश-ए-जन्नत है ज़मीं पर कि नहींये नुमाइश-गह-ए-तामीर-ओ-तरक़्क़ी ये ज़मीं
हाँ ज़रा रुक जाइए इतनी न उजलत कीजिएइस ज़ियारत-गाह-ए-आलम की ज़ियारत कीजिए
ऐ इश्क़ कहीं ले चल इस पाप की बस्ती सेनफ़रत-गह-ए-आलम से ल'अनत-गह-ए-हस्ती से
आह जौलाँ-गाह-ए-आलम-गीर यानी वो हिसारदोश पर अपने उठाए सैकड़ों सदियों का बार
हर गाम पे है शो'बदा-ए-नफ़्स का फंदारक़्क़ासा-ए-औहाम का दरबार है आलम
ग़ुलामान-ए-आलम की पुश्त-ओ-पनाहअहिंसा के बंदों की उम्मीद-दगाह
साथ चलती है तो काँटों से गुज़रना होगाकासा-ए-दिल ग़म-ओ-आलाम से भरना होगा
सुनता हूँ जब अहबाब सेक़िस्से ग़म-ए-अय्याम के
ये रिवायात-ए-कुहनऔर ग़म-ए-अय्याम के रिसते हुए ज़ख़्म
हमनशींख़्वाब-गाह-ए-‘अदम से परे
काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम की
दिलों में किस लिए आख़िरग़म-ए-अय्याम है साक़ी
न सोग में हूँ कि उस को ओढूँग़म-ओ-अलम ख़ल्क़ को दिखाऊँ
और मिरी बात पर वो मुफ़्लिस माँग़म-ए-औलाद भूल कर मुझ को
दूर होगी ग़म-ए-अय्याम की तपती हुई धूपतेरी ज़ुल्फ़ों का महकता हुआ साया होगा
बाज़ के मुँह ग़म-ए-आलाम से काले करतीबाज़ को मौत की देवी के हवाले करती
अपनी ज़ंजीरों से आज़ाद नहीं हूँ शायदमैं भी गर्दिश-ए-गह-ए-अय्याम का ज़िंदानी हूँ
ग़म-ओ-अलम का ये इक जहाँ हैलहू से तहरीर दास्ताँ है
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