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नज़्म
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
हर आन नफ़अ' और टोटे में क्यूँ मरता फिरता है बन बन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
लिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ा
छुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ततारी बन कर लिए फिरी मुझ को हर-सू
यही हयात-ए-साइक़ा-फ़ितरत बनी तअत्तुल कभी नुमू
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
दम-ए-सुब्ह दर-ब-दर हैं
हुज़ूर के नुतफ़े को मुबारक के निस्फ़ विर्सा से बे-मो'तबर हैं
फ़हमीदा रियाज़
नज़्म
चोर-बाज़ारी की जड़ थे और बड़े बट-मार थे
नफ़अ-ख़ोरी के सिवा हर काम से बेज़ार थे
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मुबारक माह के अंदर हमीं से नफ़अ-ख़ोरी है
नहीं होता है बातिल जिस से रोज़ा ये वो चोरी है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
नफ़अ-ख़ोरों का दिवाला तक निकलवाया गया
''ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ''