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नज़्म
तितलियाँ अपने परों पर पा के क़ाबू हर तरफ़
सेहन-ए-गुलशन की रविश पर रक़्स फ़रमाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
है दाख़िल फ़ितरत-ए-मुनइ'म में नादारों को तड़पाना
सर-ए-पा-ए-हिक़ारत से हर इक बेकस को ठुकराना
टीका राम सुख़न
नज़्म
अकेले फूल चुन लें बाग़ में तो ख़ैर चुन भी लें
मगर तन्हा प-ए-गुल-गश्त मैं जाऊँ न वो जाएँ
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
सज्दा-रेज़ी के लिए इस रहगुज़र में ऐ जबीं
नक़्श-ए-पा-ए-दोस्त की तक़लीद होनी चाहिए
मयकश अकबराबादी
नज़्म
सज्दा-रेज़ी के लिए इस रहगुज़र में ऐ जबीं
नक़्श-ए-पा-ए-दोस्त की तक़लीद होनी चाहिए
मैकश हैदराबादी
नज़्म
ख़म जबीं होती है उस की नक़्श-ए-पा-ए-दोस्त पर
और झुक जाते हैं उस के पाँव पर दोनों जहाँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
अभी तमाम ज़ख़्म ओ दाग़ है तमद्दुन-ए-जहाँ
अभी रुख़-ए-बशर पे हैं बहमियत की झाइयाँ