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नज़्म
वो ख़ाक-ए-पाक जिस ने तेरे ख़ूँ से कर लिया वुज़ू
सदाक़तें शुजा’अतें इसी से पाएँगी नुमू
एस. ए. रहमान
नज़्म
तितलियाँ अपने परों पर पा के क़ाबू हर तरफ़
सेहन-ए-गुलशन की रविश पर रक़्स फ़रमाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
अकेले फूल चुन लें बाग़ में तो ख़ैर चुन भी लें
मगर तन्हा प-ए-गुल-गश्त मैं जाऊँ न वो जाएँ
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
फुर्क़त-ए-दर्द में बे-आब हुआ तख़्ता-ए-दाग़
किस से कहिए कि भरे रंग से ज़ख़्मों के अयाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सज्दा-रेज़ी के लिए इस रहगुज़र में ऐ जबीं
नक़्श-ए-पा-ए-दोस्त की तक़लीद होनी चाहिए
मयकश अकबराबादी
नज़्म
सज्दा-रेज़ी के लिए इस रहगुज़र में ऐ जबीं
नक़्श-ए-पा-ए-दोस्त की तक़लीद होनी चाहिए