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नज़्म
ख़िज़ाँ के जाते ही रुत का पाँसा पलट गया है
बहार की ख़ुशबुओं से गुलशन का ज़र्रा ज़र्रा महक रहा है
ताज सईद
नज़्म
वो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब को
हवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मक़्तल में कुछ तो रंग जमे जश्न-ए-रक़्स का
रंगीं लहू से पंजा-ए-सय्याद कुछ तो हो