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नज़्म
क़ौम में आठ बरस से है ये गुलशन शादाब
चेहरा-ए-गुल पे यहाँ पास-ए-अदब की है नक़ाब
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सेहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे
फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रूठने वाले ब-पास-ए-वक़्त-ओ-आदाब-ए-शबाब
पिछली बातें भूल जाने का ज़माना आ गया
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
ऐ 'सबा' ऐ ख़ामा-बरदार-ए-गुलिस्तान-ए-अदब
बिन तिरी शिरकत के महफ़िल में बनी है बात कब
सफिया अंकोलवी
नज़्म
बनाम-ए-इल्म-ओ-अदब जो पाया
अबदुल्लाह-इब्न-ए-उबय की दौलत अबू-जहल की वो ख़ासियत है
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
यहीं पे शैख़-ए-अदब अपनी राह भूलते हैं
यहीं तो शैख़-ए-अदब 'इज़्ज़-ओ-जाह भूलते हैं