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नज़्म
कभी इन पंज-वक़्ता खिड़कियों से धूप के मीनार पर चढ़ कर
ये हय-अल-सस्लात-ए-दिल की गूँजें चाक करती है
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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कभी इन पंज-वक़्ता खिड़कियों से धूप के मीनार पर चढ़ कर
ये हय-अल-सस्लात-ए-दिल की गूँजें चाक करती है