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नज़्म
भुला कर सारी दुनिया इक नई दुनिया बना डालें
पराया सा है जो लम्हा उसे अपना बना डालें
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
हैं पराया धन मगर अपनी ही रहती हैं सदा
बढ़ के बेटों से बुढ़ापे का असा हैं बेटियाँ
रूबीना मुमताज़ रूबी
नज़्म
आज का दिन हम ने पाया रोज़े रख कर एक माह
रोज़ा-दारों के लिए अल्लाह का इनआ'म है
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
मैं अपने शहर की गलियों में हूँ लेकिन पराया हूँ
दयार-ए-ग़ैर में अब क़ैद हैं वो रेशमी जल्वे