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नज़्म
फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं
हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आँख के जलवों को जब हासिल है औज-ए-ए'तिबार
होश वालो ए'तिबार-ए-क़ल्ब-ए-बीना क्यों न हो
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
जब नूर के पर्दे से हटा पर्दा-ए-ज़ुल्मात
जब सुब्ह के माथे से मिटी गर्द-ए-ख़ुराफ़ात