aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "parda-e-hurmat"
फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैंहिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है
सिपह-गरऐ शहीद-ए-हुर्मत-ए-अर्ज़-ए-वतन
भूकी सीता नंगी मरियम मुर्दा गौतमपारा-पारा शीशा-ए-हुरमत
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ातू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
वो मानूस जज़्बों से सरशार बातेंजो पस-ए-पर्दा-ए-दर्द-ए-दिल
पर्दा-ए-सेहर-ओ-असरार से टूट करमक़्तल-ए-आरज़ू बन गए
तो न बच सकेगा वक़ार-ए-हुर्मतउसी एहतियात में कट गई है मिरी हयात की दोपहर
हम-सफ़र कौन हुआ लाला-ए-सहराई कापर्दा-ए-राज़-ए-अज़ल चाक किए जाता है
पर्दा-ए-आलम-ए-तकवीं में छुपा कर ख़ुद कोअंजुमन-बंद हुआ है चमन-आरा कोई
अपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती है
इस से साबित तो हुआ सुब्ह भी हो सकती हैपर्दा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब चाक भी हो सकता है
यकायक ख़लाओं की पहनाइयों मेंपस-ए-पर्दा-ए-शब से
ज़ुल्म-पर्वर्दा ग़ुलामो भाग जाओपर्दा-ए-शब-गीर में अपने सलासिल तोड़ कर
जिन्हें देख के आँखें रौशन थींपिन्हाँ पस-ए-पर्दा-ए-ख़ाक हुए
मुमकिन है कि साहिल हो पस-ए-पर्दा-ए-तूफ़ाँभारत के मुसलमाँ
पर्दा-ए-वक़्त परएक नौहा लिखो
ये तिरे मरमरीं बाज़ू पे घनेरी ज़ुल्फ़ेंआज साकित हैं पस-ए-पर्दा-ए-तस्वीर मगर
सुब्ह होने ही को है ऐ दिल-ए-बेताब ठहरअभी ज़ंजीर छनकती है पस-ए-पर्दा-ए-साज़
इक तेग़ की जुम्बिश सी नज़र आती है मुझ कोइक हाथ पस-ए-पर्दा-ए-दर देख रहा हूँ
रूह के ज़ख़्म सुलगते हैं पस-ए-पर्दा-ए-दिलसर छुपा लेते हो तुम रेत में जिस के आगे
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