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नज़्म
परवीन शाकिर
नज़्म
वो जज़ीरे जिन के उफ़ुक़ हुजूम-ए-सहर से दीद-बहार थे
वो परिंदे अपनी तलब में जो सर-ए-कार थे
नून मीम राशिद
नज़्म
तो हर हर याद के सदक़े में अश्कों के परिंदे चूम कर आज़ाद करता हूँ
तुम्हें हँसती हुई सुन लूँ