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नज़्म
अभी परसों तो है रंगीनी-ए-हालात की छुट्टी
फिर उस के ब'अद पूरे माह है बरसात की छुट्टी
खालिद इरफ़ान
नज़्म
देखता जब उन की आँखों में सताइश की चमक
बस उसी लम्हे परों को मेरे लग जाते थे पर
बासिर सुल्तान काज़मी
नज़्म
वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे