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नज़्म
सुनाती हैं बहारें हम को पैग़ाम-ए-तरब लेकिन
बहारों के पस-ए-पर्दा ख़िज़ाँ कुछ और कहती है
रज़ी बदायुनी
नज़्म
क़स्र-ए-गीती में उमँड आया है तूफ़ान-ए-हयात
मौत लर्ज़ां है पस-ए-पर्दा-ए-दर आज की रात