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नज़्म
और फिर धुँदली फ़ज़ाओं में तू खो जाती है
देखता हूँ जो मैं मुड़ कर कि पस-ए-पुश्त है कौन
पैग़ाम आफ़ाक़ी
नज़्म
कितने दिन से यहाँ आफ़ियत का चमन ख़ाक है धूल है
ठीक है कि पस-ए-पुश्त रखे हुए ख़ून-आलूद हाथ
मोहम्मद अहमद
नज़्म
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सेहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे
फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे