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नज़्म
नए उनवान से ज़ीनत दिखाएँगे हसीं अपनी
न ऐसा पेच ज़ुल्फ़ों में न गेसू में ये ख़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
नाज़ से हर मोड़ पर खाती हुई सौ पेच-ओ-ख़म
इक दुल्हन अपनी अदा से आप शरमाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
कौन है जो बल खाते ज़मीरों के पुर-पेच धुँदलकों में
रूहों के इफ़्रीत-कदों के ज़हर-अंदोज़ महलकों में
मजीद अमजद
नज़्म
गो ये धड़का है कि हूँगा मूरिद-ए-क़हर-ओ-इताब
कह भी दूँ जो कुछ है दिल में ता-कुजा ये पेच-ओ-ताब