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नज़्म
सलासिल ताज़ियाने बेड़ियाँ फाँसी के तख़्ते हैं
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दाना-पानी कर दिया जाएगा बिल्कुल तुम पे बंद
तुम को भूखों मार के क़ब्ज़े में लाया जाएगा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
गिरी है बर्क़-ए-तपाँ दिल पे ये ख़बर सुन कर
चढ़ा दिया है भगत-सिंह को रात फाँसी पर
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
वो मेरा जो हँसते हँसते फाँसी पर चढ़ जाता है
वो मेरा जो मौत से भी दो चार क़दम बढ़ जाता है
अनवर साबरी
नज़्म
मैं हूँ सागर में फँसी तन्हा सी कश्ती की तरह
जिस की क़िस्मत में सिवा बहने के अब कुछ भी नहीं