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नज़्म
और मैं जिसे ज़बान-आवरी का कुछ पता न था
न जाने कैसे इस सुकूत के अंधेरे ग़ार से निकल के बोल उठा
सत्यपाल आनंद
नज़्म
फिर भी इतने ज़ुल्म पर क्यों आसमाँ फटता नहीं
इस तिरी दुनिया से आख़िर ज़ुल्म क्यों घटता नहीं