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नज़्म
और मैं जिसे ज़बान-आवरी का कुछ पता न था
न जाने कैसे इस सुकूत के अंधेरे ग़ार से निकल के बोल उठा
सत्यपाल आनंद
नज़्म
तूफ़ान था बाद-ओ-बाराँ का बिजली भी कड़कती फिरती थी
सर्दी से फटा जाता था बदन वो बर्फ़ ज़मीं पर गिरती थी