aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "pher"
सभी बातें सुनी तुम नेफिर आँखें फेर लीं तुम ने
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
मैं सोई जो इक शब तो देखा ये ख़्वाबबढ़ा और जिस से मिरा इज़्तिराबये देखा कि मैं जा रही हूँ कहींअँधेरा है और राह मिलती नहींलरज़ता था डर से मिरा बाल बालक़दम का था दहशत से उठना मुहालजो कुछ हौसला पा के आगे बढ़ीतो देखा क़तार एक लड़कों की थीज़मुर्रद सी पोशाक पहने हुएदिए सब के हाथों में जलते हुएवो चुप-चाप थे आगे पीछे रवाँख़ुदा जाने जाना था उन को कहाँइसी सोच में थी कि मेरा पिसरमुझे इस जमाअत में आया नज़रवो पीछे था और तेज़ चलता न थादिया उस के हाथों में जलता न थाकहा मैं ने पहचान कर मेरी जाँमुझे छोड़ कर आ गए तुम कहाँजुदाई में रहती हूँ मैं बे-क़रारपिरोती हूँ हर रोज़ अश्कों के हारन पर्वा हमारी ज़रा तुम ने कीगए छोड़ अच्छी वफ़ा तुम ने कीजो बच्चे ने देखा मिरा पेच-ओ-ताबदिया उस ने मुँह फेर कर यूँ जवाबरुलाती है तुझ को जुदाई मिरीनहीं इस में कुछ भी भलाई मिरीये कह कर वो कुछ देर तक चुप रहादिया फिर दिखा कर ये कहने लगासमझती है तू हो गया क्या इसे?तिरे आँसुओं ने बुझाया इसे!
मगर मैं आज बहुत दूर जाने वाला हूँबस और चंद नफ़स को तुम्हारे पास हूँ मैंतुम्हें जो पा के ख़ुशी है तुम उस ख़ुशी पे न जाओतुम्हें ये इल्म नहीं किस क़दर उदास हूँ मैंक्या तुम को ख़बर इस दुनिया की क्या तुम को पता इस दुनिया कामासूम दिलों को दुख देना शेवा है इस दुनिया काग़म अपना नहीं ग़म इस का है कल जाने तुम्हारा क्या होगापरवान चढ़ोगी तुम कैसे जीने का सहारा क्या होगाआओ कि तरसती बाँहों में इक बार तो तुम को भर लूँ मैंकल तुम जो बड़ी हो जाओगी जब तुम को शुऊर आ जाएगाकितने ही सवालों का धारा एहसास से टकरा जाएगासोचोगी कि दुनिया तबक़ों में तक़्सीम है क्यूँ ये फेर है क्याइंसान का इंसाँ बैरी है ये ज़ुल्म है क्या अंधेर है क्याये नस्ल है क्या ये ज़ात है क्या ये नफ़रत की तालीम है क्यूँदौलत तो बहुत है मुल्कों में दौलत की मगर तक़्सीम है क्यूँतारीख़ बताएगी तुम को इंसाँ से कहाँ पर भूल हुईसरमाए के हाथों लोगों की किस तरह मोहब्बत धूल हुईसदियों से बराबर मेहनत-कश हालात से लड़ते आए हैंछाई है जो अब तक धरती पर उस रात से लड़ते आए हैंदुनिया से अभी तक मिट न सका पर राज इजारा-दारी काग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी कामेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहींढूँडे नहीं मिलतीं वो आँखें जो आँखें हो कश्कोल नहींसोचा था कि कल इस धरती पर इक रंग नया छा जाएगाइंसान हज़ार बरसों की मेहनत का समर पा जाएगाजीने का बराबर हक़ सब को जब मिलता वो पल आ न सकाजिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सकालेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभीसौ ज़ख़्म भी खा कर मैदाँ से हटते नहीं जुरअत-मंद कभी
मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ कोअभी तक दिल में तेरे इश्क़ की क़िंदील रौशन हैतिरे जल्वों से बज़्म-ए-ज़िंदगी जन्नत-ब-दामन हैमिरी रूह अब भी तन्हाई में तुझ को याद करती हैहर इक तार-ए-नफ़स में आरज़ू बेदार है अब भीहर इक बे-रंग साअत मुंतज़िर है तेरी आमद कीनिगाहें बिछ रही हैं रास्ता ज़र-कार है अब भीमगर जान-ए-हज़ीं सदमे सहेगी आख़िरश कब तकतिरी बे-मेहरियों पर जान देगी आख़िरश कब तकतिरी आवाज़ में सोई हुई शीरीनियाँ आख़िरमिरे दिल की फ़सुर्दा ख़ल्वतों में जा न पाएँगीये अश्कों की फ़रावानी से धुँदलाई हुई आँखेंतिरी रानाइयों की तमकनत को भूल जाएँगीपुकारेंगे तुझे तो लब कोई लज़्ज़त न पाएँगेगुलू में तेरी उल्फ़त के तराने सूख जाएँगेमबादा याद-हा-ए-अहद-ए-माज़ी महव हो जाएँये पारीना फ़साने मौज-हा-ए-ग़म में खो जाएँमिरे दिल की तहों से तेरी सूरत धुल के बह जाएहरीम-ए-इश्क़ की शम-ए-दरख़्शाँ बुझ के रह जाएमबादा अजनबी दुनिया की ज़ुल्मत घेर ले तुझ कोमिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को
आज मिरा दिल फ़िक्र में हैऐ रौशनियों के शहरशब-ख़ूँ से मुँह फेर न जाए अरमानों की रौख़ैर हो तेरी लैलाओं की उन सब से कह दोआज की शब जब दिए जलाएँ ऊँची रक्खें लौ
सिमट कर किस लिए नुक़्ता नहीं बनती ज़मीं कह दोये कैसा फेर है तक़दीर का ये फेर तो शायद नहीं लेकिनये फैला आसमाँ उस वक़्त क्यूँ दिल को लुभाता है
इल्म ने आज कुरेदे हैं वो ज़ुल्मात के ढेरवक़्त ने जिस पे बिठाए थे फ़ना के पहरेजाग उठे सूर-ए-सराफ़ील से गूँगे बहरेता-अबद जिन के मुक़द्दर में थी दुनिया अंधेरये मगर अज़्मत-ए-इंसाँ है कि तक़दीर के फेर?
आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं हैभगवान के घर देर है अंधेर नहीं है
ज़बाँ फेर कर ख़ुश्क होंटों पे बोलेख़बर कर दी जाएगी जनता को कलमगर आज के दिन हलूम हलूमआज तो आप ही मेरी ख़ुराक होकहा और बस खा गया बूढे बकरे को शेर
सो अब हमजो सदियों की लम्बी मसाफ़त से लौटे हैंतो अपने रंजूर कूज़ों में झोझा हुआ हैये तेरा क़ुसूर और न मेरी ख़ता हैकोई कूज़ा-गर तो हमारा भी होगासो ये उस की हिकमतकि उस ने हमें चाक पर ढालते वक़्तलम्हों का फेर इस नज़ाकत से रखाकि हम अपनी अपनी जगह सिर्फ़ शश्दर खड़े थेकई दस्त-ए-चाबुक के बे-जान पुतलेमरे और तिरे दरमियाँ सज गए थेसो ये उस की हिकमतमगर वक़्त इस दर्जा सफ़्फ़ाक क्यों हैये मश्शाता-ए-ज़िंदगी इतनी चालाक क्यों हैमरे और तिरे दरमियाँ नौ बरस जिस ने ला कर बिछाएये नौ साल किस तौर मैं ने बिताएकि साहिल से कश्ती तक आते हुएजैसे तख़्ते के हमराह दिल डगमगाएवही नौ बरस जो मिरे और तिरे दरमियाँवक़्त की किर्चियाँ हैंज़माना भी कैसी अजब कहकशाँ हैये दुनियाए सय्यारगाँ है कि जिस में हज़ारों कवाकिबमुसलसल किसी चाक पर घूमते हैंये अज्साम के गिर्द अज्साम का रक़्स ही ज़िंदगी है मिरी जाँमिरी जान तू चाक के साथ मिट्टी के रिश्ते को पहचानता थाहसन तू ने मिटी के बे-जान पुतलों सेतख़्लीक़ के जाँ-गुसिल मरहलों मेंसदा गुफ़्तुगू सौ तरह गुफ़्तुगू कीज़हानत के पुतले मोहब्बत के ख़ालिक़ फ़क़त ये बता देकि तेरे अनासिर के अजज़ाए-तरकीब में वाहिमा कैसे आयाहसन तू वहाँ झोंपड़े मेंअकेला गले मिल के रोया था किस सेलबीब और तू और मैं और हक़ीक़त में कोई नहीं थातरह वाहिमा मेरे लब मेरे गेसू से लिपटा रहा थालबीब एक साया जिसे तू ने रोग अपनी जाँ का बनायाये साया कहीं गर हक़ीक़त भी होतातो आख़िर को तू इस हक़ीक़त से क्यों बे-ख़बर थाकि हर जिस्म के साथ इक आफ़्ताब और महताब लाज़िमये तसलीस क़ाएम है क़ाएम रहेगी
तावीज़-ए-लहद है ज़बर ओ ज़ेर ये अंधेरये दौर-ए-ज़माना के उलट फेर ये अंधेरआँगन में पड़े गर्द के हैं ढेर ये अंधेरऐ गर्दिश-ए-अय्याम ये अंधेर! ये अंधेर
दोस्त हैं अपने भाई भुलक्कड़बातें इन की सारी गड़बड़राह चलें तो रस्ता भूलेंबस में जाएँ तो बस्ता भूलेंपूरब जाएँ पच्छिम पहुँचेंमंज़िल पर अपनी कम पहुँचेंटोपी है तो जूता ग़ाएबजूता है तो मोज़ा ग़ाएबप्याली में है चमचा उल्टाफेर रहे हैं कंघया उल्टाकाम है उन का सारा उल्टाऔर तो और पजामा उल्टालौट पड़ेंगे चलते चलतेचौंक उठेंगे बैठे बैठेसौदा दे कर दाम न देंगेदाम दिए तो चीज़ न लेंगेकोई पुकारे दाम तो लाओकोई कहे बंडल तो उठाओतैरने जाएँ घड़ी भूल आएँबाग़ में जाएँ छड़ी भूल आएँवो तो ये कहिए कि ख़ुदा नेजोड़ दिए हैं आ'ज़ा तन सेबाँध रखे हैं सब कल पुर्ज़ेवर्ना हर रोज़ आप ये सुनतेगिर गई मेरी दाहिनी छँगुलीढूँड रहा हूँ बीच की उँगलीक्या कहिए औसान हैं ग़ाएबकल से दोनों कान हैं ग़ाएबएक तो साबुन-दान में पायाएक न जाने किस ने उड़ायारान एक लिपटी शाल से निकलीनाक बंधी रूमाल में निकलीतुम ने तो नहीं देखी भाईखूँटी पर थी खाल हमारीभूले कहीं सर और कहीं धड़हाए बिचारे भाई भुलक्कड़
निकले सफ़र को पैदल वो चार हम-सफ़र थेसब अपने रास्ते और मंज़िल से बा-ख़बर थेइक फ़लसफ़ी था उन में दूसरा था नाईफिर तीसरा सिपाही गंजा था जिस का भाईजंगल में रात आई लाज़िम था उन को सोनाले कर चले थे अपने वो ओढ़ना बिछौनासोए कुछ इस तरह वो उस में होशियारीहर एक का था पहरा दो घंटे बारी बारीपहले सिपाही जागा फिर आधी रात आईवो सो गया तो पहरा देने लगा था नाईलम्बे थे और घने थे जो बाल उस के सर परनाई ने मूंड डाले तेज़ उस्तुरा फेर करबेदार फ़लसफ़ी को कर के ये बोला नाईबारी अब आप की है उठ जाओ मेरे भाईजब हाथ फ़लसफ़ी ने चंदिया पे अपनी फेराआपे से हो के बाहर नाई को उस ने घेराये क्या ग़ज़ब किया है नाहक़ उसे उठायाबारी थी फ़लसफ़ी की गंजे को क्यों जगाया
1यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैंज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं नेशम्अ जलती है पर इक रात में जल जाती हैयाँ तो एक उम्र इसी तरह से जलते गुज़रीकौन सी ख़ाक है ये जाने कहाँ का है ख़मीरइक नए साँचे में हर रोज़ ही ढलते गुज़रीकिस तरह मैं ने गुज़ारी हैं ये ग़म की घड़ियाँकाश मैं ऐसी कहानी को सुना भी सकतातअ'ना-ज़न हैं जो मिरे हाल पे अरबाब-ए-नशातउन को इक बार मैं ऐ काश रुला भी सकतामैं कि शाएर हूँ मैं पैग़ामबर-ए-फ़ितरत हूँमेरी तख़्ईल में है एक जहान-ए-बेदारदस्तरस में मिरी नज़्ज़ारा-ए-गुल-हा-ए-चमनमेरे इदराक में हैं कुन-फ़यकूँ के असरारमिरे अशआ'र में है क़ल्ब-ए-हज़ीं की धड़कनमेरी नज़्मों में मिरी रूह की दिल-दोज़ पुकारफिर भी रह रह के खटकती है मिरे दिल में ये बातकि मिरे पास तो अल्फ़ाज़ का इक पर्दा हैसिर्फ़ अल्फ़ाज़ से तस्वीर नहीं बन सकतीसिर्फ़ एहसास में हालात की तफ़्सीर कहाँसिर्फ़ फ़रियाद में ज़ख़्मों की वो ज़ंजीर कहाँऐसी ज़ंजीर कि एक एक कड़ी में जिस कीकितनी खोई हुई ख़ुशियों के मनाज़िर पिन्हाँकितनी भूली हुई यादों के पुर-असरार खंडरकितने उजड़े हुए लूटे हुए सुनसान नगरकितने आते हुए जाते हुए चेहरों के नुक़ूशकितने बनते हुए मिटते हुए लम्हात का राज़कितनी उलझी हुई राहों के नशेब और फ़राज़2क्या कहूँ मुझ को कहाँ लाई मिरी उम्र-ए-रवाँआँख खोली तो हर इक सम्त अँधेरों का समाँरेंगती ऊँघती मग़्मूम सी इक राहगुज़ारगर्द-ए-आलाम में खोया हुआ मंज़िल का निशाँगेसू-ए-शाम से लिपटी हुई ग़म की ज़ंजीरसीना-ए-शब से निकलती हुई फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँठंडी ठंडी सी हवाओं में वो ग़ुर्बत की थकनदर-ओ-दीवार पे तारीक से साए लर्ज़ांकितनी खोई हुई बीमार ओ फ़सुर्दा आँखेंटिमटिमाते से दिए चार तरफ़ नौहा-कुनाँमुज़्महिल चेहरे मसाइब की गिराँ-बारी सेदिल-ए-मजरूह से उठता हुआ ग़मनाक धुआँयही तारीकी-ए-ग़म तो मिरा गहवारा हैमैं इसी कोख में था नूर-ए-सहर के मानिंदहर तरफ़ सोग में डूबा हुआ मेरा माहौलमेरा उजड़ा हुआ घर 'मीर' के घर के मानिंदइक तरफ़ अज़्मत-ए-अस्लाफ़ का माथे पे ग़ुरूरऔर इक सम्त वो इफ़्लास के फैले हुए जालभूक की आग में झुलसे हुए सारे अरमाँक़र्ज़ के बोझ से जीने की उमंगें पामालवक़्त की धुँद में लिपटे हुए कुछ प्यार के गीतमेहर ओ इख़्लास ज़माने की जफ़ाओं से निढालभाई भाई की मोहब्बत में निराले से शुकूकनिगह-ए-ग़ैर में जिस तरह अनोखे से सवाल''एक हंगामे पे मौक़ूफ़ थी घर की रौनक़''मुफ़्लिसी साथ लिए आई थी इक जंग-ओ-जिदालफ़ाक़ा-मस्ती में बिखरते हुए सारे रिश्तेतंग-दस्ती के सबब सारी फ़ज़ाएँ बेहालइक जहन्नम की तरह था ये मिरा गहवाराइस जहन्नम में मेरे बाप ने दम तोड़ दियाटूट कर रह गए बचपन के सुहाने सपनेमुझ से मुँह फेर लिया जैसे मिरी शोख़ी नेमेरे हँसते हुए चेहरे पे उदासी छाईजैसे इक रात भयानक मिरे सर पर आईराहें दुश्वार मगर राह-नुमा कोई न थासामने वुसअ'त-ए-अफ़्लाक ख़ुदा कोई न थामेरे अज्दाद की मीरास ये वीरान सा घरजिस को घेरे हुए हर सम्त तबाही के भँवरजिस की छत गिरती हुई टूटा हुआ दरवाज़ाहर तरफ़ जैसे बिखरता हुआ इक शीराज़ान कहीं अतलस-ओ-कमख़्वाब न दीबा-ओ-हरीरहर तरफ़ मुँह को बसोरे हुए जैसे तक़दीरमुझ को उस घर से मोहब्बत तो भला क्या होतीयाँ अगर दिल में न जीने की तमन्ना होतीये समझ कर कि यही है मिरी क़िस्मत का लिखाउस की दीवार के साए में लिपटा रहतालेकिन इस दिल की ख़लिश ने मुझे बेदार कियामुझ को हालात से आमादा-ए-पैकार कियाबे-कसी रख़्त-ए-सफ़र बन कर मिरे साथ चलीयाद आई थी मुझे गाँव की एक एक गलीलहलहाती हुई फ़सलें वो मिरे आम के बाग़वो मकानों में लरज़ते हुए धुँदले से चराग़दूर तक पानी में फैले हुए वो धान के खेतऔर तालाब-किनारे वो चमकती हुई रेतमेरे हम-उम्र वो साथी वो मिरे हम-जोलीमेरे स्कूल के वो दोस्त मिरी वो टोलीएक बार उन की निगाहों ने मुझे देखा थाजैसे इक बार मिरे दिल ने भी कुछ सोचा था''मैं ने जब वादी-ए-ग़ुर्बत में क़दम रक्खा थादूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को''
ये नहीं तो फेर ले आँखें ये जल्वा और हैतेरी दुनिया और है शायर की दुनिया और है
घनघोर घटा तुली खड़ी थीपर बूँद अभी नहीं पड़ी थीहर क़तरा के दिल में था ये ख़तरानाचीज़ हूँ मैं ग़रीब क़तरातर मुझ से किसी का लब न होगामैं और की गूँ न आप जोगाक्या खेत की मैं बुझाऊँगा प्यासअपना ही करूँगा सत्या-नासख़ाली हाथों से क्या सख़ावतफीकी बातों में क्या हलावतकिस बिरते पे मैं करूँ दिलेरीमैं कौन हूँ क्या बिसात मेरीहर क़तरा के दिल में था यही ग़मसरगोशियाँ हो रही थीं बाहमखिचड़ी सी घटा में पक रही थीकुछ कुछ बिजली चमक रही थीइक क़तरा कि था बड़ा दिलावरहिम्मत के मुहीत का शनावरफ़य्याज़ ओ जव्वाद ओ नेक-निय्यतभड़की उस की रग-ए-हमिय्यतबोला ललकार कर कि आओ!मेरे पीछे क़दम बढ़ाओकर गुज़रो जो हो सके कुछ एहसानडालो मुर्दा ज़मीन में जानयारो! ये हचर-मचर कहाँ तकअपनी सी करो बने जहाँ तकमिल कर जो करोगे जाँ-फ़िशानीमैदान पे फेर दोगे पानीकहता हूँ ये सब से बरमला मैंआते हो तो आओ लो चला मैंये कह के वो हो गया रवाना''दुश्वार है जी पे खेल जाना''हर-चंद कि था वो बे-बिज़ाअतकी उस ने मगर बड़ी शुजाअतदेखी जुरअत जो उस सखी कीदो-चार ने और पैरवी कीफिर एक के ब'अद एक लपकाक़तरा क़तरा ज़मीं पे टपकाआख़िर क़तरों का बंध गया तारबारिश लगी होने मोसला-धारपानी पानी हुआ बयाबाँसैराब हुए चमन ख़याबाँथी क़हत से पाएमाल ख़िल्क़तइस मेंह से हुई निहाल ख़िल्क़तजुरअत क़तरा की कर गई कामबाक़ी है जहाँ में आज तक नामऐ साहिबो! क़ौम की ख़बर लोक़तरों का सा इत्तिफ़ाक़ कर लोक़तरों ही से होगी नहर जारीचल निकलेंगी कश्तियाँ तुम्हारी
हम अपना मुँह फेर लेते हैंऔर शहर से दूरजाने लगते हैंहमें अपने पास से जाता देख करशहर को शायद बहुत डर लगता हैवो जल्दी जल्दी हमारे पीछे आने लगता हैऔर कहता है मुझे भीअपने साथ ले चलो
मशरिक़ी यूपी कर्फ़्यू मेंये धरती कितनी सुंदर हैये सुंदर और दुखी धरतीये धानी आँचल पूरब कातेज़ रफ़्तार रेल के साथहवा में उड़ता जाता हैपड़ा झिल-मिल लहराता हैदूर तक हरे खेत खलियानये धरती औरत कोई किसानसँभाले सर पर भारी बोझचली है खेत से घर की ओरवही घर जिस की छत पर आजक्रोध का गिध मंडराता हैझपट कर पर फैलाता हैओस से गीला है सब्ज़ाकि गीले हैं मेरे दो नैनपड़े माटी पत्थर के ढेरवही मस्जिद मंदिर के फेरतने लोगों के तेवर देखइसी धरती पर सोया पूतजाग कर तुम्हें मनाता है'कबीरा' कुछ समझाता हैजहाँ हों नफ़रत के घमसाननहीं रहते उस जा भगवाननहीं करता है नज़र रहीमनहीं करते हैं फेरा रामतुम्हारी मिन्नत करता हैख़ाक पर सीस झुकाता है'कबीरा' कुछ समझाता हैइसी सरजू नदिया के पारकमल-कुंजों पर जहाँ बहारखड़े हैं हरे बाँस के झुण्डगड़ा है गौतम का संदेशखिले हैं जहाँ बसंती फूलखुदा है पत्थर पर उपदेशअड़े जब दो फ़िर्क़ों की आनतुले हों दे देने पर जानहै असली जीत की बस ये रीतकि दोनों जाएँ बराबर जीतनतीजा-ख़ेज़ यही अंजामन समझो वर्ना जंग तमामहुई जिस युद्ध में इक की हारवो होता रहेगा बारम-बारन दोनों जब तक मिट जाएँन दोनों जाएँ बराबर हारयही टकराव का है क़ानूनयही गौतम का उत्तम ज्ञानकि जिस के आगे एक जहानअदब से सीस झुकाता हैतुम्ही तो वारिस थे इस केतुम्हें क्यूँ बिसरा जाता हैसजे रहनुमा के सर दस्तारपड़ें पांडव के गले में हारजले हैं जिन के चूल्हे रोज़भरे हैं जिन के सदा भण्डारअरे तू मूरख क्यूँ हर बारजान कर धोका खाता हैलहू में आप नहाता है
शाम शाम जैसी थी रास्तों पे हलचल थीकाम करने वाले सबअपना फ़र्ज़ अदा कर केअपने अपने मैदाँ सेकुछ थके तो कुछ हारेअपने घर को जाते थेभीड़ थी दुकानों परघर को लौटने वालेअगली सुब्ह की ख़ातिररुक के माल लेते थेहर किसी को जल्दी थीऔर शाम ढलती थीएक हम थे आवाराकल न था कोई सौदाइस लिए सड़क पर हमधीरे धीरे बढ़ते थेभागते हुए लोगों पर निगाह करते थेऔर उन पे हँसते थेअपनी मस्तियों में गुमबे-नियाज़ दुनिया सेआगे बढ़ रहे थे हममुस्कुरा रहे थे हमलेकिन एक मंज़िल परहम ठिठक गए इक दमएक अजनबी लड़कीहम पे इक नज़र कर केख़ूब ख़ूब हँसती थीमुँह को फेर लेती थीफिर पलट के वो हम को देखती थी हँसती थीजाने अपने जैसों परउस की खिलखिलाहट नेकौन सा असर डालाकिस ने जाने क्या सोचाकिस ने जाने क्या समझाहै ख़बर मुझे अपनीमेरी मस्तियाँ सारीशाम के धुँदलके मेंदूर होती जाती थींख़ुद पे शर्म आती थीऔर वो शोख़ सी लड़कीहम पे हँसती जाती थीअब मिरी निगाहों को अपना ध्यान आया थाअजनबी सी लड़की ने दिल बहुत जलाया थाअब मैं ज़ात का अपनी ख़ुद तवाफ़ करता थाअपने अक्स को अपने आइने में तकता थाअब नियाज़-मंदी थी मेरी बे-नियाज़ी मेंअब वो अजनबी लड़कीदूसरे इक आवारापर निगाह करती थीउस को देख कर फिर वोबे-पनाह हँसती थीवो अजीब लड़की थी वो अजीब लड़की थी
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