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नज़्म
धूप के झुलसे हुए रुख़ पर मशक़्क़त के निशाँ
खेत से फेरे हुए मुँह घर की जानिब है रवाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
बर्क़ी चक्कर में चकरा कर चहके तो ख़ुशी से लाल हुए
इक धूम धड़क्की फेरे में सब पैसे इस्ति'माल हुए
सय्यद ज़मीर जाफ़री
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
और वो मेरे चार-सू फेरे खेल खेल कर
मेरा आँचल थामे थामे जाने क्या क्या पूछ पूछ कर थक ही गया है
नाहीद क़ासमी
नज़्म
थे ख़ार-ज़ार जिस जा है बुलबुलों का मस्कन
अल्लाह किस ग़ज़ब के हर आन हैं ये फेरे
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
थे ख़ार-ज़ार जिस जा है बुलबुलों का मस्कन
अल्लाह किस ग़ज़ब के हर आन हैं ये फेरे