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नज़्म
क्या भर पूर विसाल था जिस ने उस शाएर को जन्म दिया
गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है
फ़हमीदा रियाज़
नज़्म
वो ख़मोशी शाम की जिस पर तकल्लुम हो फ़िदा
वो दरख़्तों पर तफ़क्कुर का समाँ छाया हुआ