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नज़्म
इन बगूलों के हमराह यूँ रक़्स करती रहोगी
कितने सहराओं में तुम ने फोड़े हैं पाँव के छाले
साजिदा ज़ैदी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या ज़रूरी है कि हम फ़ोन पे बातें भी करें
क्या ज़रूरी है कि हर लफ़्ज़ महकने भी लगे
मुनव्वर राना
नज़्म
फ़ोन पर किस को सुनाऊँगी मैं अपना हाल-ए-ज़ार
किस की बातें सुन के आएगा मिरे दिल को क़रार