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नज़्म
कि जब तुम हाथ को मोड़ो नहीं होगी मुझे तकलीफ़
कि जब तुम आँख को फोड़ो तो चीख़ें भी न निकलेंगी
नील अहमद
नज़्म
चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ
पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आठ करोड़ मस्ख़रे निकल आते हैं अपने रंगे चेहरों और लम्बी टोपियों के साथ
तोड़-फोड़ डालते हैं आसमान