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नज़्म
मिरी क़िस्मत में इस मय-ख़ाने का साग़र नहीं यारब
एवज़ में इस के मुझ को मशरब-ए-पीर-ए-मुग़ाँ दे दे
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
रिंद झूम उठते थे मस्तान अदा पर जिस की
अब यहाँ कौन है उस पीर-ए-मुग़ाँ की मानिंद
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
यहाँ परहेज़ कैसा आओ रिंदान-ए-वतन आओ
कि जाम अपना है अपना मै-कदा पीर-ए-मुग़ाँ अपना
राम लाल वर्मा हिंदी
नज़्म
बरहमन शैख़ से पीर-ए-मुग़ाँ से साक़ियों से और वाइ'ज़ से
ये अक्सर सोचता हूँ जा के कह दूँ मैं
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
बहर-ए-तवाफ़ जाना पीर-ए-मुग़ाँ के दर पर
और उस की इक निगह से सरमस्त हो के आना
ख़ुशी मोहम्मद नाज़िर
नज़्म
शाइ'र-ए-हिन्दोस्ताँ ऐ शाइ'र-ए-जादू-बयाँ
हिन्द के ख़ुम-ख़ाना-ए-इरफ़ाँ के ऐ पीर-ए-मुग़ाँ