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नज़्म
जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं
सहर से शाम तक मसरूफ़ लेकिन मुस्कुराती थीं
असना बद्र
नज़्म
ज़द में कोई चीज़ आ जाए तो उस को पीस कर
इर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी के राज़ बतलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
इक तरफ़ नफ़रत खड़ी है दूसरी जानिब ग़ुरूर
क़हर की चक्की में पिस जाएँ न बच्चे बे-क़ुसूर
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
अज़दहों की लड़ाई में छोटे-मोटे साँप
मक्खियों और चियूँटियों की तरह पिस कर रह जाते हैं