aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "plane"
मोटर दौड़ लगाती हैछुक छुक गाड़ी आती हैतोप से आग निकलती हैप्लेन में बत्ती जलती हैगुड़िया आँखें खोलती हैआगे पीछे डोलती हैमुर्ग़ी अंडे देती हैचिड़िया दाने लेती हैकुत्ता बाजा सुनता हैऊँट खड़ा सर धुनता हैबंदर बैंड बजाता हैहाथी सूंड नचाता हैभालू दारू पीता हैगाए के ऊपर चीता हैसारे खिलौने हैं लेकिनये सब सच्चे लगते हैंऔर खिलौने जैसे तोअपने बच्चे लगते हैं
मुझ को कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँइश्क़ नाकाम सही ज़िंदगी नाकाम नहींइन को अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलबशौक़-ए-बेकार सही सई-ए-ग़म-ए-अंजाम नहीं
अभी इक साल गुज़रा है यही मौसम यही दिन थेमगर मैं अपने कमरे में बहुत अफ़्सुर्दा बैठा थान कोई साँवले महबूब की यादों का अफ़्सानान ऐवान-ए-ज़मिस्ताँ की तरफ़ जाने की कुछ ख़्वाहिशकिसी ने हाल पूछा तो बहुत ही बे-नियाज़ी सेकहा जी हाँ ख़ुदा का शुक्र है मैं ख़ैरियत से हूँकोई ये पूछता क्यूँ आज कल कोई ग़ज़ल लिक्खीन जाने बात क्या है इन दिनों कुछ ऐसा लगता हैतुम्हारी हर ग़ज़ल में मीर का अंदाज़ मिलता हैहर इक मिसरे से जैसे धीमी धीमी आँच उठती हैतुम्हारे शेर पढ़ कर जाने क्यूँ महसूस होता हैकि कोई साज़ पर मद्धम सुरों में गुनगुनाता हैमगर इक बात पूछूँ तुम ख़फ़ा तो हो न जाओगेये आख़िर क्या सबब है आज कल नज़्में नहीं लिखतेतुम्हारी आप-बीती भी अभी तक ना-मुकम्मल हैइसे तो नाक़िदान-ए-फ़न ने सुनते ही सराहा हैमैं सब सुनता मगर ये दिल ही दिल में सोचता रहतामिरे अहबाब क्या जानें कि मुझ पर क्या गुज़रती हैमिरे अफ़्कार पे ये कैसी वीरानी सी छाई हैबहुत कुछ सोचता हूँ फिर भी अब सोचा नहीं जाताबहुत कुछ चाहता हूँ फिर भी कोई बस नहीं चलतामगर इस बेबसी में भी मिरे दिल की ये हालत थीकभी जब कोई अच्छी चीज़ पढ़ने के लिए मिलतीतो पहरों रूह पर इक वज्द की सी कैफ़ियत होतीरगों में मेरी जैसे ख़ूँ की गर्दिश तेज़ हो जातीलहू का एक इक क़तरा ये कहता मैं तो ज़िंदा हूँमिरी पामालियों में पल रही है इक तवानाईयही आलम रहा तो जाने मैं किस रोज़ उठ बैठूँबसंत आया तो यूँ आया कि मैं भी जैसे उठ बैठासवेरा होते ही हर सम्त से झोंके हवाओं केनई ख़ुश्बू लिए मुझ को जगाने के लिए आएजिधर भी आँख उठाता हूँ शफ़क़ की मुस्कुराहट हैवही सूरज है लेकिन और ही कुछ जगमगाहट हैन जाने कैसे कैसे फूल अब मुझ को बुलाते हैंन जाने कितने कितने रंग से दिल को लुभाते हैंफ़ज़ा में दूर तक फैले हुए वो खेत सरसों केये कहते हैं कि अब अरमाँ निकालो अपने बरसों केतुम्हारे सामने फैला हुआ मैदान सारा हैकोई आवाज़ देता है कि आओ तुम हमारे होमिरी धरती के बेटे मेरी दुनिया के दुलारे होतुम्हारी आँख में जो ख़्वाब सोए हैं वो मेरे हैंतुम्हारे अश्क ने जो बीज बोए हैं वो मेरे हैंइसी वादी में फिर से लौट कर अब तुम को आना हैतुम्हारी ही ये बस्ती है तुम्हीं को फिर बसाना हैअब इस बस्ती में रखते ही क़दम कुछ ऐसा लगता हैकि इस का ज़र्रा ज़र्रा पत्ता पत्ता कुछ नया सा हैहर इक रस्ते पे जैसे कुछ नए चेहरे से मिलते हैंयही जी चाहता है जो मिले अब उस से ये पूछेंतुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ के रहने वाले होकुछ ऐसा जान पड़ता है कि पहले भी मिले हैं हमरहे हैं साथ या इक दूसरे को जानते हैं हमअगर तुम साथ थे तो तुम भी शायद दोस्त थे मेरेमुझे याद आया दोनों साथ ही कॉलेज में पढ़ते थेवो सारे दोस्तों का जम्अ होना मेरे कमरे मेंवो गप शप क़हक़हे वो अपने अपने इश्क़ के क़िस्सेवो मीरास रोड की बातें वो चर्चे ख़ूब-रूयों केकभी आवारागर्दी अपनी उन वीरान सड़कों कीकभी बातों में रातें काटना सुनसान जाड़ों कीकभी वो चाँदनी में अपना यूँ ही घूमते रहनाकभी वो चाय की मेज़ों पे घंटों बैठना सब कावो बातें इल्म-ओ-हिकमत की कभी शिकवे-शिकायत कीतुम्हें तो याद होगा उन में ही इक दोस्त शाइर थाज़रा देखो तो मुझ को ग़ौर से शायद वो मैं ही थाबहुत दिन में मिले हैं हम तो आओ आज जी भर करहँसें बोलें कहीं आवारागर्दी के लिए निकलेंचलें और चल के सारे दोस्तों को फिर बुला लाएँसजाएँ आज फिर महफ़िल कहीं पीने पिलाने कीमैं तुम को आज अपनी कुछ नई बातें बताऊँगामैं तुम को आज अपनी कुछ नई नज़्में सुनाऊँगा
मगर न जानेवो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेकि जिस पे ख़ुद से विसाल तक का गुमाँ नहीं है?वो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेवो रुक गया है दिलों के इबहाम के किनारे?वही किनारा कि जिस के आगे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!मगर ये सच है,मैं तुझ को पाने की (ख़ुद को पाने की) आरज़ू में निकल पड़ा थाउस एक मुमकिन की जुस्तुजू मेंजो तू है मैं हूँमैं ऐसे चेहरे को ढूँढता थाजो तू है मैं हूँमैं ऐसी तस्वीर के तआक़ुब में घूमता थाजो तू है मैं हूँ!मैं इस तआक़ुब मेंकितने आग़ाज़ गिन चुका हूँ(में उस से डरता हूँ जो ये कहताहै मुझ को अब कोई डर नहीं है)मैं इस तआक़ुब में कितनी गलियों से,कितने चौकों से,कितने गूँगे मुजस्समों से, गुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने बाग़ों से,कितनी अंधी शराब रातों से,कितनी बाँहों से,कितनी चाहत के कितने बिफरे समुंदरों सेगुज़र गया हूँमैं कितनी होश ओ अमल की शम्ओं से,कितने ईमाँ के गुम्बदों सेगुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने आग़ाज़ कितने अंजाम गिन चुका हूँअब इस तआक़ुब में कोई दर हैन कोई आता हुआ ज़मानाहर एक मंज़िल जो रह गई हैफ़क़त गुज़रता हुआ फ़सानातमाम रस्ते, तमाम बूझे सवाल, बे-वज़्न हो चुके हैंजवाब, तारीख़ रूप धारेबस अपनी तकरार कर रहे हैंजवाब हम हैं जवाब हम हैंहमें यक़ीं है जवाब हम हैंयक़ीं को कैसे यक़ीं से दोहरा रहे हैं कैसे!मगर वो सब आप अपनी ज़िद हैंतमाम, जैसे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!
मैं सपनों मेंऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँऔर हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँमैं अपने लफ़्ज़ों के ज़रिएतुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगाजो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगेऔर तुम्हारी देख-भाल करनेवालों के हाथों को काँपने नहीं देंगेऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने कीख़बरें गर्दिश भी करें भी तो क्यामैं तुम्हारे लिएअपने नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगाअस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँकुछ लोग तुम से बिछड़ भी जाएँतो हौसला मत हारनाक्यों कि रात जितनी चाहेमर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती हैरंग उतर जाने के लिए होते हैंऔर ज़ख़्म भर जाने के लिए होते हैं
यहीं पे माथों की रौशनी जल के बुझ गई हैसपाट चेहरों के ख़ाली पन्ने खुले हुए हैंहुरूफ़ आँखों के मिट चुके हैं
मैं अजब आदमी हूँराएगानी के तसलसुल ने मुझे तोड़ दियामेरी पूँजी मिरे क़िर्तास ओ क़लमकुछ किताबें पए-तस्कीन-ए-जुनूँकौन तालिब है भला माया-ए-बे-माया काकोई जागीर नहींज़िंदगी शेर के मेले में गँवा दी मैं नेइस पे नाज़ाँ था कि हर लफ़्ज़ मिरेहल्क़ा-ए-एहसास में हैइस पे फ़ाख़िर था कि हैं ख़्वाबमिरे कीसे मेंमैं ने क्या क्या न फ़न-ए-शेर की आराइश कीलफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ महलहर्फ़-दर-हर्फ़ ख़यालसत्र-दर-सत्र जुनूँ
लाओ हाथ अपना लाओ ज़राछू के मेरा बदनअपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनोनाफ़ के उस तरफ़उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुमबस यहीं छोड़ दोथोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दोमेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गयामेरे ईसा मिरे दर्द के चारागरमेरा हर मू-ए-तनउस हथेली से तस्कीन पाने लगाउस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगाउँगलियों से बदन उस का पहचान लोतुम उसे जान लोचूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँउन की हर पोर को चूमने दो मुझेनाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़राफूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँमेरी आँखों से आँसू उबलते हुएउन से सींचूँगी मेंफूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझेअपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लबये चमकती हुई काली आँखेंमिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैंतुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्यातुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दियामेरे अंदर अँधेरे का आसेब थाया कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़लायूँही फिरती थी मैंज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुईदिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुईतुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दियाफूटती है मिरे जिस्म से रौशनीसब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईंसब पयम्बर जो अब तक उतारे गएसब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परेरंग संगीत सर फूल कलियाँ शजरसुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँउन के मफ़्हूम जो भी बताए गएख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्मे सुनाए गएसब ऋषी सब मुनी अंबिया औलियाख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदाआज सब पर मुझेए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
महसूस ये होता हैदुख झेले थे जो अब तकबे-नाम मसाफ़त मेंलिखने की मोहब्बत मेंपढ़ने की ज़रूरत मेंबे-सूद रियाज़त थीबे-फ़ैज़ इबादत थीजो ख़्वाब भी देखे थेइन जागती आँखों नेसब ख़ाम-ख़याली थीफिर भी तुझे पाने कीदिल के किसी गोशे मेंख़्वाहिश तो बचा ली थीलेकिन तुझे पा कर भीऔर ख़ुद को गँवा कर भीइस हब्स के मौसम की खिड़की से हवा आईन फूल से ख़ुशबू की कोई भी सदा आईअब नींद है आँखों मेंनाँ दिल में वो पहली सी ताज़ा सुख़न-आराईनाँ लफ़्ज़ मिरे निकलेनाँ हर्फ़-ओ-मुआ'फ़ी की दानिश मिरे काम आईनादीदा रिफ़ाक़त मेंजितनी भी अज़िय्यत थीसब मेरे ही नाम आईकुछ भी तो नहीं वैसाजैसा तुझे सोचा थाजितना तुझे चाहा था
ये नूर का नहीं तो सियाही का तूर हैहर झूट हर गुनाह का हम को शुऊ'र हैदुनिया के और देसों को धन पर ग़ुरूर हैफ़न्न-ए-गदागरी पे हमें भी उबूर हैसब कुछ है अपने देस में रोटी नहीं तो क्यावा'दा लपेट लो जो लंगोटी नहीं तो क्या
फ़ख़्र है मुझ को उसी दर से शरफ़ पाने कामैं शराबी हूँ उसी रिंद के मयख़ाने का
सुनाऊँ तुम्हें बात इक रात कीकि वो रात अँधेरी थी बरसात कीचमकने से जुगनू के था इक समाँहवा पर उड़ीं जैसे चिंगारियाँपड़ी एक बच्चे की उन पे नज़रपकड़ ही लिया एक को दौड़ करचमकदार कीड़ा जो भाया उसेतो टोपी में झट-पट छुपाया उसेवो झम झम चमकता इधर से उधरफिरा कोई रस्ता न पाया मगरतो ग़मगीन क़ैदी ने की इल्तिजाजुगनूऐ छोटे शिकारी मुझे कर रिहाख़ुदा के लिए तू मुझे छोड़ देमेरी क़ैद के जाल को तोड़ देबच्चाकरूँगा न आज़ाद उस वक़्त तककि मैं देख लूँ दिन में तेरी चमकजुगनूचमक मेरी दिन में न देखोगे तुमउजाले में हो जाएगी वो तो गुमबच्चाअरे छोटे कीड़े न दे दम मुझेकि है वाक़फ़िय्यत अभी कम तुझेउजाले में दिन के खुलेगा कमालकि इतने से कीड़े में क्या है कमालधुआँ है न शो'ला न गर्मी न आँचचमकने की तेरे करूँगा मैं जाँचजुगनूये क़ुदरत की कारीगरी है जनाबकि ज़र्रा को चमकाए जूँ आफ़्ताबमुझे दी है इस वास्ते ये चमककि तुम देख कर मुझ को जाओ ठिठकन अल्हड़-पने से करो पाएमालसँभल कर चलो आदमी की सी चाल
बात है तो कुछ ऐब सीलेकिन फिर भी हैहो गई थी मोहब्बतएक मर्द कोएक सुनहरी मछली सेलहरों से अटखेलियाँ करतीबल खाती चमचमाती मछलीभा गई थी मर्द कोटुकटुकी बाँधे पहरोंदेखता रहता वोउस शोख़ की अठखेलियाँमछली को भी अच्छा लगता थामर्द का इस तरह से निहारनाबंध गए दोनों प्यार के बंधन मेंमिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थीमर्द ने मछली से इल्तिजा कीएक बार सिर्फ़ एक बारपानी से बाहर आने की कोशिश करोमोहब्बत का जुनूनइतना शदीद था किबग़ैर कुछ सोचे-समझेमछली पानी से बाहर आ गईछट-पटा गईबहुत बरी तरह से छट-पटा गईलेकिन अबवो अपने महबूब की बाँहों में थीमोहब्बत की कैफ़ियत मेंकुछ पल कोसारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रहीदो बदन इक जान हो गएसैराब हो कर महबूब नेमहबूबा को पानी के सुपुर्द कर दियाबड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़और बड़ा दर्दनाक था ये मेलहर बार पूरी ताक़त बटोर करचल पड़ती महबूबामहबूब से मिलनेतड़फड़ाती छट-पटातीप्यार देती प्यार पातीसैराब करती सैराब होतीऔर फिर लौट आती पानी मेंएक दिनमछली को जाने क्या सूझीउस ने मर्द से कहाआज तुम आओमैं पानी में कैसे आऊँकुछ पल अपने साँसें रोक लोमछली ने कहासाँस रोक लूँया'नी जीना रोक लूँकुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैंतुम्हारे पाससाँस रोक लूँगा तो जियूँगा कैसेमर्द ने कहामछली सकते में थीएक ही पल में:मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत केबाहमी रिश्ते की सच्चाईउस के सामने थीअबकुछ जानने पाने और चाहने कोबाक़ी नहीं बचा थामछली ने बे-कैफ़ निगाहों सेमर्द को देखाऔर डूब गईबे-पनाह गहराइयों मेंउधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्दजीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा हैऔर सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है
मैं ने संजो कर रखे हैकुछ पुराने डब्बे सिगरेट केजिस पर हम नेज़िंदगी का प्लान बनाया थावो सिगरेट ख़राब हो गई हैलेकिन प्लान अभी भीसंजीदा लगता है
ये दा'वा हैजहाँ में चंद लोगों काकि हम ने ज़िंदगी को जीत रक्खा हैहमारे पास या'नी एटमी हथियार हैं इतनेहमारा दोस्त नन्हा एलीयन भी हैकरोड़ों साल की तारीख़ को अब जानते हैं हमकि हम ने मौत पर अब फ़त्ह पा ली हैप्लैनेट मार्स पर पानी भी ढूँडा हैये सब कहते हुए अक्सरवो शायद भूल जाते हैंअभी इक चीज़ बाक़ी है कि जो अनमैप्ड है अब तकजिसे हम ज़ेहन कहते हैंहमारे साइंस-दानों ने भी माना हैकि अब तक कुछ ही हिस्सा ज़ेहन काहम जान पाए हैंबहुत कुछ है जिसे अब भी हमें डीकोड करना हैमैं अक्सर सोचता हूँसोच कर हैरान होता हूँफ़क़त कुछ ग्राम के इस ज़ेहन से ये सारी हलचल हैसितारे चाँद सूरज तितलियाँ जुगनू भरी रातेंये सारा आर्ट और उस आर्ट पर तन्क़ीद जो कुछ हैकिताबों से भरी हर लाइब्रेरीऔर इंसानों के दिल में बढ़ रही दूरीकहीं नाराज़गी आँखों में भर कर ख़ुद में ही घुटनाकहीं पर भूक बीमारी या पॉलिटिक्स की पॉवरये एफ़बी और ट्विटर पर जो जारी हैं सभी बहसेंऔर इंस्टाग्राम पर हर पल की तस्वीरेंये दुनिया-भर की फिल्में और फ़ेस्टिवलये मेरे सामने बैठे हुए फूलों से नाज़ुक लोगमिरे होंठों से एक इक नज़्म का यूँ टूटते रहनाफ़क़त कुछ ग्राम के इस ज़ेहन से ही सारी हलचल हैनिगाहें मोड़ कर ये देखना मेरातुम्हारा मुस्कुराना भीफ़लक को देख कर यूँ रूठ जाना भीकि अपनी ज़िंदगी में रौशनी के नाम परकुछ भी नहीं हैऔर ये क्या खेल हैजिस में महज़ मातें ही मातें हैंमहज़ घातें ही घातें हैंमगर ये दुख जो हम को रात-दिन महसूस होता हैहमारे ज़ेहन से उठता धुआँ है बसअगर हम ग़ौर से देखें तो ढेरों राज़ खुलते हैंकि मैं तुम से अगर कहता हूँतुम से इश्क़ करता हूँतो ये सुन कर तुम्हारी साँस की लय तेज़ चलती हैयही अन्फ़ास का पर्दाजो उठता हैजो गिरता हैइसी अन्फ़ास के पर्दे के पीछे सेहमारा ज़ेहन सब कुछ देखता हैसोचता है बात करता हैसदी से बंद दरवाज़ों के पीछे सेकोई आवाज़ आती हैहमें लगता है ये सब कुछ हमीं तो कर रहे हैंपर हक़ीक़त और ही कुछ हैहमें मा'लूम करना हैकि जलते ज़ेहन के जंगल का राजा कौन है आख़िरहमें मा'लूम करना हैहमारे ज़ेहन में छुप कर इशारे कौन करता हैये किस के हुक्म पर हम रोज़ मरते और जीते हैंये किस के वास्ते हम ज़िंदगी का ज़हर पीते हैं
वो क्या आता कि गोया दौर में जाम-ए-शराब आतावो क्या आता रंगीली रागनी रंगीं रुबाब आतामुझे रंगीनियों में रंगने वो रंगीं सहाब आतालबों की मय पिलाने झूमता मस्त शबाब आतायहीं खेतों में पानी के किनारे याद है अब भी
वो कहाँ गुम हो गयाकोई नक़्श-ए-पा नहीं जिस की ज़बाँएक हर्फ़-ए-ना-शुनीदा ही कहेऔर मैं दिन-रात के सहरा मेंउस को ढूँढ कर पाने की कोई आरज़ू ले चलूँरास्तों पर कोई नक़्श-ए-पा नहीं
अज़ीम काम करूँ कोई एक दिन सोचाकि रहती दुनिया में अपना भी नाम रह जाएमगर वो काम हो क्या ज़ेहन में नहीं आयापयम्बरी तो ज़ियाँ जान का है दावा क्यातू जाने सूली पे चढ़ना हो या चलें आरेकि ज़िंदा आग की लपटों की नज़्र होना पड़ेख़याल आया फ़ुनून-ए-लतीफ़ा ढेरों हैंसनम-तराशी है नग़्मागरी कि नक़्क़ाशीये सब ही दाइमी शोहरत का इक वसीला हैंमगर न लफ़्ज़ों पे क़ुदरत न रंग क़ाबू मेंफिर इक ज़रिया सियासत है नाम पाने काअलावा नाम के मोहरे बना के लोगों कोबिसात-ए-अर्ज़ पे शतरंज खेल सकते हैंमगर ये फ़न भी मिरी दस्तरस से बाहर थाफिर और क्या हो बहुत कुछ ख़याल दौड़ायाअलावा इन के मुझे और कुछ नहीं सूझाज़माने बाद समुंदर किनारे बैठा थाअज़ीम शय है समुंदर भी मेरे दिल ने कहावो क्या तरीक़ा हो मैं इस का भाग बन जाऊँसमझ में आया नहीं कोई रास्ता भी जबतो झुँझला के समुंदर में कर दिया पेशाब
रात की काली बारिश नेचेहरों की वर्दीकीचड़ से भर दी हैमेरे सीने के पिंजरे मेंख़ून का गर्दिश करने वाला लट्टूनफ़रत के पौदों के ऊपरघूम रहा हैतुम ने ऐसे काँटेमेरी शिरयानों में बोए हैंऐसी दोपहरों की ज़र्दीमेरे गालों पे लीपी हैकि मैं बिस्तर की शिकनों मेंअपनी आँखें बो कर रोता हूँपहली बार जब ग़म की पुतली क़ाश कोचेहरे से नोचा थाजब ग़ुर्बत के औराक़हवा में उड़ते थेजब ख़ाली मेदे की तस्वीर बना करउस में चीज़ें रखता थाफटे हुए कपड़ों में जबतस्वीर छुपा कर रखता थामेरी शहवतकुँवार पने की दहलीज़ों परअपना ख़ुत्बा लिखती थीबीस बरस उन गलियों की दीवारों सेटकरा टकरा करमेरे कंधे रेत के पुश्ते बन करढेते जाते हैंमैं जो तेरी रानों के जंगल मेंकाले फूल को तोड़ने निकला थाअब देख रहा हूँदिल की कोरी मिट्टी मेंतेरे जिस्म की पतली शाख़ें उगी हुई थींऔर इक आवारा सन्नाटाछतों पर भारी क़दमों सेबड़ी आहिस्तगी के साथ चलता हैतो वो चुपके से मेरे पास आती हैऔर अपने धीमे लहजे मेंवो सारी दास्तानें कह सुनाती हैजिन्हें सुन कर मैं धीमी आँच परपहरों सुलगता हूँकिसी गिरजे के वीराँ लॉन मेंजब जनवरीअपने सुनहरी गेसुओं को खोल करकोई पुराना गीत गाती हैतो वो इक अन-छूई नन की तरहपत्थर के बेंचों परमिरे काँधे पर सर रखेमिरे चेहरे पे अपनी उँगलियों मेंकभी जब शाम रोती हैसियह काफ़ी के प्यालों सेलपकती भाप मेंफिर आँधी की आमद से ऐसी गर्द हुईऐसा हब्स मिरी साँसों में फैलातेरे जिस्म की कश्ती मेंमैं अपने कपड़े भूल आयापर तुम ने आधी रात को ऐसी चुटकी लीनींद की ढोलकघुटनों की ज़र्बों से चकनाचूर हुईअब मुँह से शीरा बहता हैउन ज़ख़्मों काजिन के टाँके अंदर ही अंदर टूटे हैंबिजली की तारों के ऊपरकव्वे क़तार में बैठे हैंबारिश के पानी में जिन केअस्करी बाज़ू हिलते हैंरानों की ये नीली वरीदेंजिन में दुआ का नक़्शी कूज़ाउलट गया हैमैं ने उन गलियों मेंअपने मरने की अफ़्वाह सुनी हैख़ुश-इलहान मोअज़्ज़िन कीआवाज़ से चिड़ियाँ उड़ती हैंऐ रस्तों की राधातेरे वस्ल की ख़ातिरजिस्म के निजी हिस्से धो करलौट के फिर मैं आया हूँ
इक कभी न बीतने वाली शबइक हाथ न आने वाला दिनइस शब से जान छुड़ाने मेंउस दिन को ढूँड के लाने मेंहम रेज़ा रेज़ा हो के रहेजो पाया था वो खो के रहेइस पाने में इस खोने मेंहोने में और न होने मेंकुछ सूद-ओ-ज़ियाँ का हाथ है क्याया और ही कोई बात है क्याइस सारी इज़ाफ़ी बातों मेंबस एक ही बात ज़रूरी हैयाँ शब की सहर से दूरी हैइस शब के तसलसुल में पिन्हाँइक घोर अँधेरा जहल का हैजिस जहल की काली आँधी नेजीवन के सच को चाट लियाऔर हम ने इसी वीरानी मेंइक अंधा जीवन काट लियाइस काले अंधे जीवन मेंग़ुर्बत की तीरा-बख़्ती नेकुछ क़िस्मत के एहसान ने भीकुछ जब्र-ए-वक़्त की सख़्ती नेइंसान से क्या कुछ छीना हैये जीना कैसा जीना हैपसमाँदगी-ए-जाँ रूह तलकदर आई सियाही ओढ़े हुएहम मक़्तल-ए-शब में आ बैठेइंकार का दामन छोड़े हुएइंकार कि जिस की जुम्बिश-ए-लबहर शब की सहर बन सकती हैये जुरअत-ओ-ना-फ़रमानी-ए-शबबेबस की सिपर बन सकती हैफिर क्यों इस क़त्ल-गह-ए-शब मेंआ बैठे हैं जी हार के हमइक़रार से लब आसूदा सहीमुनकिर तो नहीं इंकार के हम
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