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नज़्म
मोहसिन नक़वी
नज़्म
कभी सूखे गुलाबों से
कभी कुछ ऐसे ख़्वाबों से कि जिन की किर्चियाँ चुन कर मिरी पोरें हुईं छलनी
सफ़ीया चौधरी
नज़्म
राख के ढेर में शायद कोई जज़्बा अभी ज़िंदा हो और इस दस्त
हिना-रंग की पोरें न झुलस दे