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नज़्म
प्रेम-रस से लाओ भर कर ख़ुशनुमा पिचकारियाँ
हों नई दामान-ए-हस्ती पर लताफ़त-बारियाँ
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
इक प्रेम पुजारी आया है चरनों में ध्यान लगाने को
भगवान तुम्हारी मूरत पर श्रधा के फूल चढ़ाने को
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
कि ज़िंदगी गोया मौज की रस्सी हो गई है
उस के जीवन में न कोई प्रेम बचा है न प्रतीक्षा
सुधांशु फ़िरदौस
नज़्म
मिरी तन्हाइयो तुम ही लगा लो मुझ को सीने से
कि मैं घबरा गया हूँ इस तरह रो रो के जीने से