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नज़्म
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
नज़्म
अब मुझे तेरी मौजूदगी चाहिए
अपने साटन में सहमे हुए सुर्ख़ पैरों को अब मेरे हाथों पे रख
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की
ख़ुम, शीशे, जाम, झलकते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
चली थीं अपने पैरों पर जो तुम पहले-पहल बेटा
मुझे ऐसा लगा था चल पड़ी दिल की मिरे धड़कन
अफ़ीफ़ सिराज
नज़्म
हमें मा'लूम है कि अगले वक़्तों में ये लोग
तिरे पैरों के साँचों से नई सम्तों के अंदाज़े लगाएँगे
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
जैसे मौजों का तरन्नुम जैसे जल-परियों के गीत
एक इक लय में हज़ारों ज़मज़मे गाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अभी तो हुस्न के पैरों पे है जब्र-ए-हिना-बंदी
अभी है इश्क़ पर आईन-ए-फ़र्सूदा की पाबंदी