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नज़्म
कल सोला टेड्डी पैसों में किस धूम की रास रचाई है
लैला के लबों पर सुर्ख़ी है मजनूँ के गले में टाई है
सय्यद ज़मीर जाफ़री
नज़्म
ज़रीफ़ जबलपूरी
नज़्म
सरीर काबिरी
नज़्म
चार पैसों के लिए उफ़ ये तलातुम है 'अज़ीज़
आज भी जिस्म के अम्बार हैं बाज़ारों में