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नज़्म
अम्बर बहराईची
नज़्म
सूरज एक गगन पर अपना इक अपना पूनम एक है देश एक हैं हम
हिंदू मुस्लिम सिख 'ईसाई जुदा हैं राहें मंज़िल एक
बेकल उत्साही
नज़्म
दिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम को
जो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता था
वफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नम
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़
इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कलियाँ बे-ज़ार हैं शबनम के तलव्वुन से मगर
तू ने इस दीदा-ए-पुर-नम को तो देखा होता