aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "putlaa"
सुहानी नुमूद-ए-जहाँ की घड़ी थीतबस्सुम-फ़शाँ ज़िंदगी की कली थीकहीं मुहर को ताज-ए-ज़र मिल रहा थाअता चाँद को चाँदनी हो रही थीसियह पैरहन शाम को दे रहे थेसितारों को ता'लीम-ए-ताबिंदगी थीकहीं शाख़-ए-हस्ती को लगते थे पत्तेकहीं ज़िंदगी की कली फूटती थीफ़रिश्ते सिखाते थे शबनम को रोनाहँसी गुल को पहले-पहल आ रही थीअता दर्द होता था शाइ'र के दिल कोख़ुदी तिश्ना-काम मय-ए-बे-ख़ुदी थीउठी अव्वल अव्वल घटा काली कालीकोई हूर चोटी को खोले खड़ी थीज़मीं को था दा'वा कि मैं आसमाँ हूँमकाँ कह रहा था कि मैं ला-मकाँ हूँग़रज़ इस क़दर ये नज़ारा था प्याराकि नज़ारगी हो सरापा नज़ारामलक आज़माते थे परवाज़ अपनीजबीनों से नूर-ए-अज़ल आश्काराफ़रिश्ता था इक इश्क़ था नाम जिस काकि थी रहबरी उस की सब का सहाराफ़रिश्ता कि पुतला था बे-ताबियों कामलक का मलक और पारे का पारापए सैर फ़िरदौस को जा रहा थाक़ज़ा से मिला राह में वो क़ज़ा-राये पूछा तिरा नाम क्या काम क्या हैनहीं आँख को दीद तेरी गवाराहुआ सुन के गोया क़ज़ा का फ़रिश्ताअजल हूँ मिरा काम है आश्काराउड़ाती हूँ मैं रख़्त-ए-हस्ती के पुर्ज़ेबुझाती हूँ मैं ज़िंदगी का शरारामिरी आँख में जादू-ए-नीस्ती हैपयाम-ए-फ़ना है उसी का इशारामगर एक हस्ती है दुनिया में ऐसीवो आतिश है मैं सामने उस के पाराशरर बन के रहती है इंसाँ के दिल मेंवो है नूर-ए-मुतलक़ की आँखों का ताराटपकती है आँखों से बन बन के आँसूवो आँसू कि हो जिन की तल्ख़ी गवारासुनी इश्क़ ने गुफ़्तुगू जब क़ज़ा कीहँसी उस के लब पर हुई आश्कारागिरी इस तबस्सुम की बिजली अजल परअंधेरे का हो नूर में क्या गुज़ाराबक़ा को जो देखा फ़ना हो गई वोक़ज़ा थी शिकार क़ज़ा हो गई वो
और फिर सब को इक जा मिलाया गयागूँध कर एक पुतला बनाया गया
अंदलीबों को मिली आह-ओ-बुका की तालीमऔर परवानों को दी सोज़-ए-वफ़ा की तालीमजब हर इक चीज़ को क़ुदरत ने अता की तालीमआई हिस्से में तिरे ज़ौक़-ए-फ़ना की तालीमनर्म ओ नाज़ुक तुझे आज़ा दिए जलने के लिएदिल दिया आग के शोलों पे पिघलने के लिएरंग तस्वीर के पर्दे में जो चमका तेराख़ुद-ब-ख़ुद लूट गया जल्वा-ए-राना तेराढाल कर काल-बुद-ए-नूर में पुतला तेरायद-ए-क़ुदरत ने बनाया जो सरापा तेराभर दिया कूट के सोज़-ए-ग़म-ए-शौहर दिल मेंरख दिया चीर के इक शोला-ए-मुज़्तर दिल मेंतू वो थी शम्अ कि परवाना बनाया तुझ कोतू वो लैला थी कि दीवाना बनाया तुझ कोरौनक़-ए-ख़ल्वत-ए-शाहाना बनाया तुझ कोनाज़िश-ए-हिमात-ए-मर्दाना बनाया तुझ कोनाज़ आया तिरे हिस्से में अदा भी आईजाँ-फ़रोशी भी, मोहब्बत भी, वफ़ा भी, आईआई दुनिया में जो तू हुस्न में यकता बन करचमन-ए-दहर में फूली गुल-ए-राना बन कररही माँ बाप की आँखों का जो तारा बन करदिल-ए-शौहर में रही ख़ाल-ए-सुवैदा बन करहुस्न-ए-ख़िदमत से शगुफ़्ता दिल-ए-शौहर रक्खाकि क़दम जादा-ए-ताअत से न बाहर रक्खातेरी फ़ितरत में मुरव्वत भी थी ग़म-ख़्वारी भीतेरी सूरत में अदा भी तरह-दारी भीजल्वा-ए-हुस्न में शामिल थी निको-कारी भीदर्द आया तिरे हिस्से में, तो ख़ुद्दारी भीआग पर भी न तुझे आह मचलते देखातपिश-ए-हुस्न को पहलू न बदलते देखातू वो इस्मत की थी ओ आईना-सीमा तस्वीरहुस्न-ए-सीरत से थी तेरी मुतजला तस्वीरलाख तस्वीरों से थी इक तिरी ज़ेबा तस्वीरतुझ को क़ुदरत ने बनाया था सरापा तस्वीरनूर ही नूर तिरे जल्वा-ए-मस्तूर में थाअंजुम-ए-नाज़ का झुरमुट रुख़-ए-पुर-नूर में थालब में एजाज़ हया चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ में थीकि क़यामत की अदा तेरे हर अंदाज़ में थीशक्ल फिरती जो तिरी दीदा-ए-ग़म्माज़ में थीबर्क़-ए-बेताब तिरी जल्वा-गाह-ए-नाज़ में थीये वो बिजली थी क़यामत की तड़प थी जिस मेंशोला-ए-नार-ए-उक़ूबत की तड़प थी जिस मेंये वो बिजली थी जो तेग़-ए-शरर-अफ़्शाँ हो करकौंद उठी क़िला-ए-चित्तौड़ में जौलाँ हो करये वो बिजली थी जो सोज़-ए-ग़म-ए-हिर्मां हो करख़ाक सी लोट गई तेरी पशीमाँ हो करये वो बिजली थी तुझे जिस के असर ने फूँकारफ़्ता रफ़्ता तपिश-ए-सोज़-ए-जिगर ने फूँकाआह ओ इश्वा ओ अंदाज़ ओ अदा की देवीआह ओ हिन्द के नामूस-ए-वफ़ा की देवीआह ओ परतव-ए-अनवार-ए-सफ़ा की देवीओ ज़ियारत-कदा-ए-शर्म-ओ-हया की देवीतेरी तक़्दीस का क़ाएल है ज़माना अब तकतेरी इफ़्फ़त का ज़बाँ पर है फ़साना अब तकआफ़रीं है तिरी जाँ-बाज़ी ओ हिम्मत के लिएआफ़रीं है तिरी इफ़्फ़त तिरी इस्मत के लिएक्या मिटाएगा ज़माना तिरी शोहरत के लिएकि चली आती है इक ख़ल्क़ ज़ियारत के लिएनक़्श अब तक तिरी अज़्मत का है बैठा दिल मेंतू वो देवी है, तिरा लगता है मेला दिल में
जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात हैसब से अशरफ़ आदमी की ज़ात हैइस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआअक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गयाइल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गयाइस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़सोच कर हर काम कर सकता है येशेर को भी राम कर सकता है येये सफ़ाई से चटानें तोड़ देअपनी दानाई से दरिया मोड़ देमन-चला है इस की हिम्मत है बुलंदडाल सकता है सितारों पर कमंदइस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़राआग में कूदा ये सूली पर चढ़ाइस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ हैअर्श तक इस नूर की परवाज़ हैइस की बातों में अजब तासीर हैख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर हैये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़ेएक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़ेऔर अगर इस्याँ की दलदल में फँसेइस का दर्जा कम हो हैवानात सेये कभी रुई से बढ़ कर नर्म हैये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म हैएक हालत पर नहीं इस का मिज़ाजहर ज़माने में बदलता है रिवाजऔर था पहले ये अब कुछ और हैआए दिन इस का निराला तौर हैइस ने बेहद रूप बदले आज तकइस की तदबीरों से हैराँ है फ़लकडॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकीलइन का होना है तरक़्क़ी की दलीलइस के पहलू में वो दिल मौजूद हैजो भड़कने में निरा बारूद हैरेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ हैजिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ हैखोल आँखें जंग की रफ़्तार देखदेख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देखये कहीं हाकिम कहीं महकूम हैये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम हैआदमी जब ग़ैर के आगे झुकाआदमिय्यत से भटकता ही गयाआदमी मिलना बहुत दुश्वार हैख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार हैप्यारे बच्चो आदमी बन कर रहोहर किसी के साथ हमदर्दी करोसच अगर पूछो तो बस वो मर्द हैजिस के दिल में दूसरों का दर्द है'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनीउस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी
कभी जब लफ़्ज़-ए-आज़ादी का सच्चा तर्जुमाँ होगातो फिर ये हिन्द ख़्वाबों का मिरे हिन्दोस्ताँ होगाउभर आएगा ख़ुद्दारी का जज़्बा मुल्क वालों काफ़क़त ईसार होगा मुद्दआ इन ख़ुश-ख़यालों कान होगी चोर-बाज़ारी न अय्यारी न मक्कारीन ये बाक़ी रहेगी रिश्वतों की गर्म-बाज़ारीहुकूमत का जो ढाँचा है बदल जाएगा ये यकसरकि इख़राजात हैं जो आज-कल हो जाएँगे कमतरहुकूमत में सभी अहल-ए-हुनर के क़द्र-दाँ होंगेजो जाहिल हैं वसाइल से न अपने कामराँ होंगेन इतने टैक्स ही होंगे कि जिन से जान हो दूभरख़ुशी से टैक्स सब देंगे बचेगा इस क़द्र खा करमिरे हिन्दोस्ताँ के खेत जब देखो हरे होंगेअनाज इतना मिरे खलियान ग़ल्ले से भरे होंगेमवेशी इस क़दर होंगे बहेंगी दूध की नहरेंमसर्रत के समुंदर में उठेंगी हर तरफ़ लहरेंमशीनों के लिए मुहताज होंगे हम न ग़ैरों केज़रूरत का हर इक सामाँ बनेगा मुल्क में अपनेसुहूलत बर्क़-ओ-टेलीफ़ोन की होगी देहातों मेंसड़क हर गाँव तक बन जाएगी पक्की देहातों मेंनिकल आएँगे काफ़ी इस ज़मीं से तेल के चश्मेन हम मुहताज सोने के रहेंगे और न लोहे केन कोई बे-पढ़ा-लिखा न कोई बे-हुनर होगान औरों के लिए बे-कार कोई दर्द-ए-सर होगाहमारे मुल्क को इक मरकज़-ए-ता'लीम पाएँगेयहाँ ता'लीम लेने दूसरे मुल्कों से आएँगेजो बूढ़े होंगे और मोहताज उन्हें सरकार पालेगीयतीमों और बेवाओं को सीने से लगा लेगीहुकूमत और पब्लिक के भले किरदार अगर होंगेतो मौसम और दरिया भी रहेंगे ठीक ही अपनेहमारे दम का लोहा अहल-ए-क़ुव्वत मान जाएँगेजो हैं कमज़ोर हर सूरत में हामी हम को पाएँगेग़रज़ ये है वो ख़्वाबों का मिरे हिन्दोस्ताँ होगान इक चेहरे पे जिस में फ़िक्र-ओ-वहशत का निशाँ होगान होगी भूक की ला'नत न बेकारी न बीमारीन होगी बे-ईमानी और न अय्यारी न ग़द्दारीशुजाअ'त और जवाँ-मर्दी का पुतला होगा हर इंसाँमोहब्बत और ख़िदमत होगा हर इंसान का ईमाँ'शिफ़ा' मुमकिन है ऐसे दिन न मेरी ज़ीस्त में आएँमैं वो पौदा लगाऊँगा कि नस्लें जिस का फल खाएँ
बना है आदमी रहम-ओ-करम का पुतला क्योंहै इस सिफ़त से उसे मुत्तसिफ़ किया किस नेदरिंदगी ही सेगर इंतिसाब हो इस काकहाँ से आएगा इल्ज़ाम कोई फ़ितरत पर
थका-हारा अज़ल की वुसअतों में ख़ाक का पुतलाहज़ारों मन की तारीकी तले था साकित-ओ-जामिदहर इक ज़ी-रूह की नज़रों का मरकज़, मौजिब-ए-हैरतचमकते नूरियों की शौकत-ए-बेताब का शाहिद
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगेये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!तुझे सुब्ह बाज़ार में बूढ़े अत्तार यूसुफ़की दुक्कान पर मैं ने देखातो तेरी निगाहों में वो ताबनाकीथी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँजहां-ज़ाद नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!ये वो दौर था जिस में मैं नेकभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिबपलट कर न देखावो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतलेगिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँवो सर-गोशियों में ये कहतेहसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?वो हम से ख़ुद अपने अमल सेख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़राकि जैसे किसी शहर-ए-मदफ़ून पर वक़्त गुज़रेतग़ारों में मिट्टीकभी जिस की ख़ुश्बू से वारफ़्ता होता था मैंसंग-बस्ता पड़ी थीसुराही-ओ-मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस ओ गुल-दाँमिरी हेच-माया मईशत के इज़हार-ए-फ़न के सहारेशिकस्ता पड़े थेमैं ख़ुद मैं हसन कूज़ा-गर पा-ब-गिल ख़ाक-बर-सर बरहनासर-ए-चाक ज़ोलीदा-मू सर-ब-ज़ानूकिसी ग़म-ज़दा देवता की तरह वाहिमा केगिल-ओ-ला से ख़्वाबों के सय्याल कूज़े बनाता रहा थाजहाँ-ज़ाद नौ साल पहलेतू नादाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थीकि मैं ने हसन कूज़ा-गर नेतिरी क़ाफ़ की सी उफ़ुक़-ताब आँखोंमें देखी है वो ताबनाकीकि जिस से मेरे जिस्म ओ जाँ अब्र ओ महताब कारह-गुज़र बन गए थेजहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब-गूँ रातवो रूद-ए-दजला का साहिलवो कश्ती वो मल्लाह की बंद आँखेंकिसी ख़स्ता-जाँ रंज-बर कूज़ा-गर के लिएएक ही रात वो कुहरबा थीकि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वजूदउस की जाँ उस का पैकरमगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकलाहसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!
अक़ाएद पर क़यामत आएगी तरमीम-ए-मिल्लत सेनया काबा बनेगा मग़रिबी पुतले सनम होंगे
ये आए दिन के हंगामेये जब देखो सफ़र करनायहाँ जाना वहाँ जानाइसे मिलना उसे मिलनाहमारे सारे लम्हेऐसे लगते हैंकि जैसे ट्रेन के चलने से पहलेरेलवे-स्टेशन परजल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडतेकोई मुसाफ़िर होंजिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत हैकभी लगता हैतुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने काख़याल आएकहाँ इतनी भी फ़ुर्सत हैमगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तोकोई उम्मीद चलते चलतेजब मुँह मोड़ती है तोकभी कोई ख़ुशी का फूलजब इस दिल में खिलता हैकभी जब मुझ को अपने ज़ेहन सेकोई ख़याल इनआम मिलता हैकभी जब इक तमन्ना पूरी होने सेये दिल ख़ाली सा होता हैकभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता हैतो ये एहसास होता हैख़ुशी हो ग़म हो हैरत होकोई जज़्बा होइस में जब कहीं इक मोड़ आए तोवहाँ पल भर कोसारी दुनिया पीछे छूट जाती हैवहाँ पल भर कोइस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी कीडोरी टूट जाती हैमुझे उस मोड़ परबस इक तुम्हारी ही ज़रूरत हैमगर ये ज़िंदगी की ख़ूबसूरत इक हक़ीक़त हैकि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया हैतो हर उस मोड़ पर मैं नेतुम्हें हम-राह पाया है
(3)नए ज़माने में अगर उदास ख़ुद को पाऊँगाये शाम याद कर के अपने ग़म को भूल जाऊँगाअयादत-ए-हबीब से वो आज ज़िंदगी मिलीख़ुशी भी चौंक चौक उठी ग़म की आँख खुल गईअगरचे डॉक्टर ने मुझ को मौत से बचा लियापर इस के ब'अद उस निगाह ने मुझे जिला लियानिगाह-ए-यार तुझ से अपनी मंज़िलें मैं पाऊँगातुझे जो भूल जाऊँगा तो राह भूल जाऊँगा(4)क़रीब-तर मैं हो चला हूँ दुख की काएनात सेमैं अजनबी नहीं रहा हयात से ममात सेवो दुख सहे कि मुझ पे खुल गया है दर्द-ए-काएनातहै अपने आँसुओं से मुझ पे आईना ग़म-ए-हयातये बे-क़ुसूर जान-दार दर्द झेलते हुएये ख़ाक-ओ-ख़ूँ के पुतले अपनी जाँ पे खेलते हुएवो ज़ीस्त की कराह जिस से बे-क़रार है फ़ज़ावो ज़िंदगी की आह जिस से काँप उठती है फ़ज़ाकफ़न है आँसुओं का दुख की मारी काएनात परहयात क्या इन्हें हक़ीक़तों से होना बे-ख़बरजो आँख जागती रही है आदमी की मौत परवो अब्र-ए-रंग-रंग को भी देखती है सादा-तरसिखा गया दुख मिरा पुरानी पीर जाननानिगाह-ए-यार थी जहाँ भी आज मेरी रहनुमायही नहीं कि मुझ को आज ज़िंदगी नई मिलीहक़ीक़त-ए-हयात मुझ पे सौ तरह से खुल गईगवाह है ये शाम और निगाह-ए-यार है गवाहख़याल-ए-मौत को मैं अपने दिल में अब न दूँगा राहजियूँगा हाँ जियूँगा ऐ निगाह-ए-आश्ना-ए-यारसदा सुहाग ज़िंदगी है और जहाँ सदा-बहार(5)अभी तो कितने ना-शुनीदा नग़्मा-ए-हयात हैंअभी निहाँ दिलों से कितने राज़-ए-काएनात हैंअभी तो ज़िंदगी के ना-चाशीदा रस हैं सैकड़ोंअभी तो हाथ में हम अहल-ए-ग़म के जस हैं सैकड़ोंअभी वो ले रही हैं मेरी शाएरी में करवटेंअभी चमकने वाली है छुपी हुई हक़ीक़तेंअभी तो बहर-ओ-बर पे सो रही हैं मेरी वो सदाएँसमेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँअभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगाअभी तो सुब्ह बन के मैं उफ़ुक़ पे थरथराऊँगाअभी तो मेरी शाएरी हक़ीक़तें लुटाएगीअभी मिरी सदा-ए-दर्द इक जहाँ पे छाएगीअभी तो आदमी असीर-ए-दाम है ग़ुलाम हैअभी तो ज़िंदगी सद-इंक़लाब का पयाम हैअभी तमाम ज़ख़्म ओ दाग़ है तमद्दुन-ए-जहाँअभी रुख़-ए-बशर पे हैं बहमियत की झाइयाँअभी मशिय्यतों पे फ़त्ह पा नहीं सका बशरअभी मुक़द्दरों को बस में ला नहीं सका बशरअभी तो इस दुखी जहाँ में मौत ही का दौर हैअभी तो जिस को ज़िंदगी कहें वो चीज़ और हैअभी तो ख़ून थोकती है ज़िंदगी बहार मेंअभी तो रोने की सदा है नग़मा-ए-सितार मेंअभी तो उड़ती हैं रुख़-ए-बहार पर हवाईयाँअभी तो दीदनी हैं हर चमन की बे-फ़ज़ाईयाँअभी फ़ज़ा-ए-दहर लेगी करवटों पे करवटेंअभी तो सोती हैं हवाओं की वो संसनाहटेंकि जिस को सुनते ही हुकूमतों के रंग-ए-रुख़ उड़ेंचपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ देंअभी तो सीना-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़लेकि जिन के जागते ही मौत का भी दिल दहल उठेअभी तो बत्न-ए-ग़ैब में है इस सवाल का जवाबख़ुदा-ए-ख़ैर-ओ-शर भी ला नहीं सका था जिस की ताबअभी तो गोद में हैं देवताओं की वो माह-ओ-सालजो देंगे बढ़ के बर्क़-ए-तूर से हयात को जलालअभी रग-ए-जहाँ में ज़िंदगी मचलने वाली हैअभी हयात की नई शराब ढलने वाली हैअभी छुरी सितम की डूब कर उछलने वाली हैअभी तो हसरत इक जहान की निकलने वाली हैअभी घन-गरज सुनाई देगी इंक़लाब कीअभी तो गोश-बर-सदा है बज़्म आफ़्ताब कीअभी तो पूंजी-वाद को जहान से मिटाना हैअभी तो सामराजों को सज़ा-ए-मौत पाना हैअभी तो दाँत पीसती है मौत शहरयारों कीअभी तो ख़ूँ उतर रहा है आँखों में सितारों कीअभी तो इश्तिराकियत के झंडे गड़ने वाले हैंअभी तो जड़ से किश्त-ओ-ख़ूँ के नज़्म उखड़ने वाले हैंअभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला हैअभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला हैमगर अभी तो ज़िंदगी मुसीबतों का नाम हैअभी तो नींद मौत की मिरे लिए हराम हैये सब पयाम इक निगाह में वो आँख दे गईब-यक-नज़र कहाँ कहाँ मुझे वो आँख ले गई
गर्मी की तपिश बुझाने वालीसर्दी का पयाम लाने वालीक़ुदरत के अजाइबात की काँआरिफ़ के लिए किताब-ए-इरफ़ाँवो शाख़-ओ-दरख़्त की जवानीवो मोर-ओ-मलख़ की ज़िंदगानीवो सारे बरस की जान बरसातवो कौन-ए-ख़ुदा की शान बरसातआई है बहुत दुआओं के बा'दवो सैकड़ों इल्तिजाओं के बा'दवो आई तो आई जान में जाँसब थे कोई दिन के वर्ना मेहमाँगर्मी से तड़प रहे थे जान-दारऔर धूप में तप रहे थे कोहसारभूबल से सिवा था रेग-ए-सहराऔर खौल रहा था आब-ए-दरियासांडे थे बिलों में मुँह छुपाएऔर हाँप रहे थे चारपाएथीं लोमड़ियाँ ज़बाँ निकालेऔर लू से हिरन हुए थे कालेचीतों को न थी शिकार की सुधहिरनों को न थी क़तार की सुधथे शेर पड़े कछार में सुस्तघड़ियाल थे रूद-बार में सुस्तढोरों का हुआ था हाल पतलाबैलों ने दिया था डाल कंधाभैंसों के लहू न था बदन मेंऔर दूध न था गऊ के थन मेंघोड़ों का छुटा था घास दानाथा प्यास का उन पे ताज़ियानागर्मी का लगा हुआ था भबकाऔर अंस निकल रहा था सब कातूफ़ान थे आँधियों के बरपाउठता था बगूले पर बगूलाआरे थे बदन पे लू के चलतेशो'ले थे ज़मीन से निकलतेथी आग का दे रही हवा कामथा आग का नाम मुफ़्त बद-नामरस्तों में सवार और पैदलसब धूप के हाथ से थे बेकलघोड़ों के न आगे उठते थे पाँवमिलती थी कहीं जो रूख की छाँवथी सब की निगाह सू-ए-अफ़्लाकपानी की जगह बरसती थी ख़ाक
सो अब हमजो सदियों की लम्बी मसाफ़त से लौटे हैंतो अपने रंजूर कूज़ों में झोझा हुआ हैये तेरा क़ुसूर और न मेरी ख़ता हैकोई कूज़ा-गर तो हमारा भी होगासो ये उस की हिकमतकि उस ने हमें चाक पर ढालते वक़्तलम्हों का फेर इस नज़ाकत से रखाकि हम अपनी अपनी जगह सिर्फ़ शश्दर खड़े थेकई दस्त-ए-चाबुक के बे-जान पुतलेमरे और तिरे दरमियाँ सज गए थेसो ये उस की हिकमतमगर वक़्त इस दर्जा सफ़्फ़ाक क्यों हैये मश्शाता-ए-ज़िंदगी इतनी चालाक क्यों हैमरे और तिरे दरमियाँ नौ बरस जिस ने ला कर बिछाएये नौ साल किस तौर मैं ने बिताएकि साहिल से कश्ती तक आते हुएजैसे तख़्ते के हमराह दिल डगमगाएवही नौ बरस जो मिरे और तिरे दरमियाँवक़्त की किर्चियाँ हैंज़माना भी कैसी अजब कहकशाँ हैये दुनियाए सय्यारगाँ है कि जिस में हज़ारों कवाकिबमुसलसल किसी चाक पर घूमते हैंये अज्साम के गिर्द अज्साम का रक़्स ही ज़िंदगी है मिरी जाँमिरी जान तू चाक के साथ मिट्टी के रिश्ते को पहचानता थाहसन तू ने मिटी के बे-जान पुतलों सेतख़्लीक़ के जाँ-गुसिल मरहलों मेंसदा गुफ़्तुगू सौ तरह गुफ़्तुगू कीज़हानत के पुतले मोहब्बत के ख़ालिक़ फ़क़त ये बता देकि तेरे अनासिर के अजज़ाए-तरकीब में वाहिमा कैसे आयाहसन तू वहाँ झोंपड़े मेंअकेला गले मिल के रोया था किस सेलबीब और तू और मैं और हक़ीक़त में कोई नहीं थातरह वाहिमा मेरे लब मेरे गेसू से लिपटा रहा थालबीब एक साया जिसे तू ने रोग अपनी जाँ का बनायाये साया कहीं गर हक़ीक़त भी होतातो आख़िर को तू इस हक़ीक़त से क्यों बे-ख़बर थाकि हर जिस्म के साथ इक आफ़्ताब और महताब लाज़िमये तसलीस क़ाएम है क़ाएम रहेगी
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
दीवाली के दीप जले हैंयार से मिलने यार चले हैंचारों जानिब धूम-धड़ाकाछोटे रॉकेट और पटाख़ाघर में फुल-झड़ियाँ छूटेमन ही मन में लड्डू फूटेदीप जले हैं घर आँगन मेंउजयारा हो जाए मन मेंअपनों की तो बात अलग हैआज तो सारे ग़ैर भले हैंदीवाली के दीप जले हैंराम की जय-जय-कार हुई हैरावन की जो हार हुई हैसच्चे का हर बोल है बालाझूटे का मुँह होगा कालासच्चाई का डंका बाजेसच के सर पर सहरा साजेझूट की लंका ख़ाक बना केराम अयोध्या लौट चले हैंदीवाली के दीप जले हैंहिन्दू मुस्लिम सिख ईसाईमिल कर खाएँ यार मिठाईभूल के शिकवे और गिले सबहँसते गाते आज मिले सबकहने को हर धर्म जुदा हैलेकिन सब का एक ख़ुदा हैइक माटी के पुतले 'हैदर'इस साँचे में ख़ूब ढले हैंदीवाली के दीप जले हैं
फूल की ख़ुशबू हँसती आईमेरे बसेरे को महकानेमैं ख़ुशबू में ख़ुशबू मुझ मेंउस को मैं जानूँ मुझ को वो जानेमुझ से छू कर मुझ में बस करइस की बहारें उस के ज़मानेलाखों फूलों की महकारेंरखते हैं गुलशन वीरानेमुझ से अलग हैं मुझ से जुदा हैंमैं बेगाना वो बेगानेउन को बिखेरा उन को उड़ायादस्त-ए-ख़िज़ाँ ने मौज-ए-सबा नेभूला-भटका नादाँ क़तराआँखों की पुतली को सजानेआँसू बन कर दौड़ा आयामेरी पलकें उस के ठिकानेउस का थिरकना, उस का तड़पनामेरे क़िस्से मेरे फ़सानेउस की हस्ती मेरी हस्तीउस के मोती मेरे ख़ज़ानेबाक़ी सारे गौहर-पारेख़ाक के ज़र्रे रेत के दानेपर्बत की ऊँची चोटी सेदामन फैलाया जो घटा नेठंडी हवा के ठंडे झोंकेबे-ख़ुद आवारा मस्तानेअपनी ठंडक ले कर आएमेरी आग में घुल-मिल जानेउन की हस्ती का पैराहनमेरी साँस के ताने-बानेउन के झकोले मेरी उमंगेंउन की नवाएँ मेरे तरानेबाक़ी सारे तूफ़ानों कोजज़्ब किया पहना-ए-फ़ज़ा नेफ़ितरत की ये गूनागूनीगुलशन बिन वादी वीरानेकाँटे कलियाँ नूर अंधेराअंजुमनें शमएँ परवानेलाखों शातिर लाखों मोहरेफैले हैं शतरंज के ख़ानेजानता हूँ मैं ये सब क्या हैंसहबा से ख़ाली पैमानेभूकी मिट्टी को सौंपे हैंदुनिया ने अपने नज़रानेजिस ने मेरा दामन थामाआया जो मुझ में बस जानेमेरे तूफ़ानों में बहनेमेरी मौजों में लहरानेमेरे सोज़-ए-दिल की लौ सेअपने मन की जोत जगानेज़ीस्त की पहनाई में फैलेमौत की गीराई को न जानेउस का बरबत मेरे नग़्मेउस के गेसू मेरे शानेमेरी नज़रें उस की दुनियामेरी साँसें उस के ज़माने
सोमनाती रिफ़अतें भारत की तहज़ीब-ए-क़दीमपाटली-पुत्रा की शोहरत मगध की शान-ए-अज़ीम
हमें बिछड़े तोकितनेदिनमहीनेसालगुज़रे हैंमगर ये चोटगहरी हैमगर ये ज़ख़्मताज़े हैंये दुख कम क्यूँ नहीं होतामेरी जानाँअगर मैं साथदो पंछी भी बैठे देखता हूँ तोमेरे माज़ी का हर मंज़रमेरी आँखों के डोरों मेंउभरता हैतड़पता हैमेरी आँखों की पुतली डूब जाती हैये दुख कम क्यूँ नहीं होतामेरी जानाँवो सारे लोगजिन की वज्ह सेहम लोग बिछड़े थेमुकम्मल ज़िंदगी कर केवो सब क़ब्र में सोए हैंतुम्हारा दुख मिरे सीने में लेकिनअब भी ज़िंदा हैजवाँ होता ही जाता हैये दुख कम क्यूँ नहीं होतामिरी जानाँअब इतनी मुद्दतों मेंतुम भी शायदभूल बैठी होमिरे सब दोस्त रिश्ता-दारलाखों मील आगे हैंसफ़र में ज़िंदगी केमगर मैं रह गया किरदारतन्हाइस कहानी मेंये दुख कम क्यूँ नहीं होतामिरी जानाँ
दिल के क़िस्सों का मुक़द्दर है परेशाँ-हालीपए तरतीब सहारों का तआक़ुब छोड़ोसोच के बख़्त में इज़हार का लम्हा कब थादिल-ए-नाकाम सराबों का तआक़ुब छोड़ोसुब्ह-दम फिर वही पुतली का तमाशा होगाजागती रात के ख़्वाबों का तआक़ुब छोड़ो
रात की काली बारिश नेचेहरों की वर्दीकीचड़ से भर दी हैमेरे सीने के पिंजरे मेंख़ून का गर्दिश करने वाला लट्टूनफ़रत के पौदों के ऊपरघूम रहा हैतुम ने ऐसे काँटेमेरी शिरयानों में बोए हैंऐसी दोपहरों की ज़र्दीमेरे गालों पे लीपी हैकि मैं बिस्तर की शिकनों मेंअपनी आँखें बो कर रोता हूँपहली बार जब ग़म की पुतली क़ाश कोचेहरे से नोचा थाजब ग़ुर्बत के औराक़हवा में उड़ते थेजब ख़ाली मेदे की तस्वीर बना करउस में चीज़ें रखता थाफटे हुए कपड़ों में जबतस्वीर छुपा कर रखता थामेरी शहवतकुँवार पने की दहलीज़ों परअपना ख़ुत्बा लिखती थीबीस बरस उन गलियों की दीवारों सेटकरा टकरा करमेरे कंधे रेत के पुश्ते बन करढेते जाते हैंमैं जो तेरी रानों के जंगल मेंकाले फूल को तोड़ने निकला थाअब देख रहा हूँदिल की कोरी मिट्टी मेंतेरे जिस्म की पतली शाख़ें उगी हुई थींऔर इक आवारा सन्नाटाछतों पर भारी क़दमों सेबड़ी आहिस्तगी के साथ चलता हैतो वो चुपके से मेरे पास आती हैऔर अपने धीमे लहजे मेंवो सारी दास्तानें कह सुनाती हैजिन्हें सुन कर मैं धीमी आँच परपहरों सुलगता हूँकिसी गिरजे के वीराँ लॉन मेंजब जनवरीअपने सुनहरी गेसुओं को खोल करकोई पुराना गीत गाती हैतो वो इक अन-छूई नन की तरहपत्थर के बेंचों परमिरे काँधे पर सर रखेमिरे चेहरे पे अपनी उँगलियों मेंकभी जब शाम रोती हैसियह काफ़ी के प्यालों सेलपकती भाप मेंफिर आँधी की आमद से ऐसी गर्द हुईऐसा हब्स मिरी साँसों में फैलातेरे जिस्म की कश्ती मेंमैं अपने कपड़े भूल आयापर तुम ने आधी रात को ऐसी चुटकी लीनींद की ढोलकघुटनों की ज़र्बों से चकनाचूर हुईअब मुँह से शीरा बहता हैउन ज़ख़्मों काजिन के टाँके अंदर ही अंदर टूटे हैंबिजली की तारों के ऊपरकव्वे क़तार में बैठे हैंबारिश के पानी में जिन केअस्करी बाज़ू हिलते हैंरानों की ये नीली वरीदेंजिन में दुआ का नक़्शी कूज़ाउलट गया हैमैं ने उन गलियों मेंअपने मरने की अफ़्वाह सुनी हैख़ुश-इलहान मोअज़्ज़िन कीआवाज़ से चिड़ियाँ उड़ती हैंऐ रस्तों की राधातेरे वस्ल की ख़ातिरजिस्म के निजी हिस्से धो करलौट के फिर मैं आया हूँ
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