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नज़्म
शुजाअ'त और जवाँ-मर्दी का पुतला होगा हर इंसाँ
मोहब्बत और ख़िदमत होगा हर इंसान का ईमाँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
थका-हारा अज़ल की वुसअतों में ख़ाक का पुतला
हज़ारों मन की तारीकी तले था साकित-ओ-जामिद
मोहम्मद शहबाज़ अकमल
नज़्म
ये ख़ाक-ओ-ख़ूँ के पुतले अपनी जाँ पे खेलते हुए
वो ज़ीस्त की कराह जिस से बे-क़रार है फ़ज़ा