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नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कि तिरे तुझ से ख़ाके बनाने की मैं
अब तलक ये इक्कावनवीं कोशिश भी पूरी नहीं कर सका हूँ
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
इस चका-चौंद में अब तुझ को पुकारूँ कैसे
सैल-ए-अनवार में तारों का गुज़र क्या होगा