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नज़्म
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बाएँ डूब गईं
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
है लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंद
डालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
'जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र'
'कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की क़स्में
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में