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नज़्म
हक़ीक़त में वही बकरा है अच्छा देख कर जिस को
क़साई कि उठे फ़र्बा है आली-शान है बकरा
शाहीन इक़बाल असर
नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
न देखो काश तुम वो ख़्वाब जो देखा किया हूँ मैं
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
जौन एलिया
नज़्म
मेरे साए से डरो तुम मिरी क़ुर्बत से डरो
अपनी जुरअत की क़सम अब मेरी जुरअत से डरो