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नज़्म
आवाज़ा-ए-हक़ जब लहरा कर भगती का तराना बनता है
ये रब्त-ए-बहम ये जज़्ब-ए-दरूँ ख़ुद एक ज़माना बनता है
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कैसे कैसे अक़्ल को दे कर दिलासे जान-ए-जाँ
रूह को तस्कीन दी है दिल को समझाया भी है
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो
कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इंतिहा-ए-क़ुर्ब-ओ-रब्त-ए-बाहमी के बावजूद
सीने में धड़कन सी दिल में दर्द सा है आज-कल