aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "radeef"
तो मैं क्या कह रहा था यानी क्या कुछ सह रहा था मैंअमाँ हाँ मेज़ पर या मेज़ पर से बह रहा था मैंरुको मैं बे-सर-ओ-पा अपने सर से भाग निकला हूँइला या अय्युहल-अबजद ज़रा यानी ज़रा ठहरोThere is an absurd I इन absurdity शायदकहीं अपने सिवा यानी कहीं अपने सिवा ठहरोतुम इस absurdity में इक रदीफ़ इक क़ाफ़िया ठहरो
शाइरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़लउर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटलनज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भीये कभी नस्र है और मुअर्रा कभीनज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँऔर आज़ाद में भी है इस का निशाँनज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र हैवज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर हैवज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुएनसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगेवज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तोइस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहोमसनवी हो क़सीदा हो या मर्सियानज़्म का मिलता है बच्चो हम को पतानज़्म में सिलसिला है ख़यालात काएक दरिया सा है देखो जज़्बात कावो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोईये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद कीवो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनोदोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगहहैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशहनज़्म में जो कहानी कही जाएगीशौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगीनज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखींजो निहायत ही मशहूर साबित हुईंकरता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआनज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
पहले जितनी बातें थीं वो तुम से थींतेरे ही नाम की एक रदीफ़ से सारे क़ाफ़िएबनते और बिगड़ते थेमैं अपने अंधे हाथों सेतेरे जिस्म के पुर-असरार ज़मानों की तहरीरें पढ़ लेता थाऔर फिर अच्छी अच्छी नज़्में घड़ लेता थातू भी तो काग़ज़ के फूलों की मानिंदहर मौसम में खिल जाती थीओर मैं हिज्र-ओ-विसाल की ख़ुश्की और तरी परतेरे लिए हर हाल में ज़िंदा रह लेता थाअपने लिए भी तेरी तरफ़ सेसारी बातें कह लेता थातेरी सूरत मेरे होने और न होनेजागने सोने की इस धूप और छाँव मेंएक ही जैसी रहती थीऔर मेरी साँसों का बख़्त तुम्हारे ही पल्लू से बँधा थालेकिन अब तो तेरी साड़ी के सब लहरएमेरे जिस्म को डस भी चुके हैंअब तो जाओमेरी पुरानी नज़्मों की अलमारी में आराम से जा कर सो जाओक्यूँकि मैं अब अपने आप से बातें करना चाहता हूँ
हँसी कल से मुझे इस बात पर है आ रही ख़ालूकि ख़ाला कह रही थीं आप का है क़ाफ़िया आलूउसी दिन से बहुत डरने लगा हूँ आप से ख़ालाजब अम्मी ने बताया आप का है क़ाफ़िया भालाअगर पूछे कोई क्या क़ाफ़िया है आप का फु्प्पीतो फ़ौरन सामने रख दूँगा ला कर तेल की कुप्पीअगर शाइ'र कहें बे-क़ाफ़िया है लफ़्ज़-ए-बहनोईमिरे बहनोई सर पर शाइ'रों के मारना डोईअगर पूछे कोई क्या क़ाफ़िया है आप का दादीतो मलमल फेंक देना ओढ़ लेना सर पे तुम खादीबहुत है घूमने का शौक़ तुम को ऐ बड़े भय्यान मारो तो बता दूँ है तुम्हारा क़ाफ़िया पहियातुम अपना क़ाफ़िया ख़ुद बन गई हो ऐ मेरी आपानज़र लग जाएगी तुम सर पे रख कर हो हो टापातुम्हारा क़ाफ़िया कोई नहीं है ऐ नहीफ़ अम्मीयही अच्छा है तुम चुपके से बन जाओ रदीफ़ अम्मी
क़ाफ़ियों से कोई छुटकारा दिलाएबन गई तकलीफ़-ए-जाँ मुझ को रदीफ़बहर है हर वक़्त दिल में मौजज़न(क़ाफ़िए की आज़माइश से गुज़रक़ाफ़िया-पैमा न बनक़ाफ़िए ने आ दबोचा क़ाफ़िया-पैमा न हो)खुरदुरे-पन को तरसती है ज़बाँक्यूँ मंझी हैं इस क़दर नज़्में मिरीक्यूँ सजी है इस क़दर मेरी ग़ज़ल(क़ाफ़िए को रोक फिर आने लगा)ज़ेहन है मजनून-ए-आदाब-ए-सुख़नदिल पुराने रस का रसिया है अभीनिकहत-ए-माज़ी का बसिया है अभी(क़ाफ़िया फिर आ गया मजबूर हूँक़ाफ़िए को रोक फिर आने लगा)सोचता हूँ बहर की मौजों में जकड़ा हूँ अभीक़ाफ़िया तो ख़ैर काफ़ी रुक गयाबहर तो टूटी नहींबहर इक बहर-ए-बसीतबहर इक देव-ए-तनोमंद-ओ-मुहीतइस क़दर जिद्दत से क्यूँ है कद मुझेज़ेहन ओ दिल हैं क्यूँ रिवायत के असीर
रदीफ़ क़ाफ़िए सब आप के लिए थे मिरेमगर न भूल के की वाह वाह आप ने भी
क़रीब आओ कि जान-ए-जानाँतुम्हें सुनाऊँ वो सारी ग़ज़लेंकि जिन का मतला' तुम्हारी आँखेंवो जिन का हर एक क़ाफ़िया हैतुम्हारी ज़ुल्फ़ों की लट सरासररदीफ़ जिन की जो सच कहूँ तोतुम्हारी अंगुश्तरी का जौहरवो जिन का हर एक शे'र गोयातुम्हारी सूरत महक रहा हैवो जिन का मक़्ता' तुम्हारा रूमालजिस के ऊपर मिरा तख़ल्लुस लिखा हुआ हैक़रीब आओ कि जान-ए-जानाँतुम्हें सुनाऊँ वो सारी ग़ज़लेंकि जिन की तशरीह तुम ही तुम हो
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आजहौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आजआबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आजहुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आजजिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहारतेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदारतेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदारता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसारकौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती हैतपती साँसों की हरारत से पिघल जाती हैपाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती हैबन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती हैज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहींनब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहींउड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहींजन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहींउस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेगोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिएफ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिएक़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिएज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिएरुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेक़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहींतुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहींतू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहींतेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहींअपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकलज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकलनफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकलक़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकलराह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझेतू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवींतेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मींहाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबींमैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहींलड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझेउठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
ये कितने फूल टूट कर बिखर गए ये क्या हुआये कितने फूल शाख़चों पे मर गए ये क्या हुआबढ़ी जो तेज़ रौशनी चमक उठी रविश रविशमगर लहू के दाग़ भी उभर गए ये क्या हुआइन्हें छुपाऊँ किस तरह नक़ाब ढूँढता हूँ मैंजिन्हें सहर निगल गई वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैंकहाँ गई वो नींद की शराब ढूँढता हूँ मैं
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
जो रविश है साहिब-ए-तख़्त कीसो मुसाहिबों का तरीक़ हैयहाँ कोतवाल भी दुज़्द-ए-शबयहाँ शैख़-ए-दीं भी फ़रीक़ है
दोपहर की गर्मी मेंबे-इरादा क़दमों सेइक सड़क पे चलता हूँतंग सी सड़क पर हैंदोनों सम्त दूकानेंख़ाली ख़ाली आँखों सेहर दुकान का तख़्तासिर्फ़ देख सकता हूँअब पढ़ा नहीं जातालोग आते जाते हैंपास से गुज़रते हैंफिर भी कितने धुँदले हैंसब हैं जैसे बे-चेहराशोर इन दुकानों काराह चलती इक गालीरेडियो की आवाज़ेंदूर की सदाएँ हैंआ रही मीलों सेजो भी सुन रहा हूँ मैंजो भी देखता हूँ मैंख़्वाब जैसा लगता हैहै भी और नहीं भी हैदोपहर की गर्मी मेंबे-इरादा क़दमों सेइक सड़क पे चलता हूँसामने के नुक्कड़ परनल दिखाई देता हैसख़्त क्यूँ है ये पानीक्यूँ गले में फँसता हैमेरे पेट में जैसेघूँसा एक लगता हैआ रहा है चक्कर साजिस्म पर पसीना हैअब सकत नहीं बाक़ीआज तीसरा दिन हैआज तीसरा दिन है
मुद्दतों बाद मिला नामा-ए-जानाँ लेकिनन कोई दिल की हिकायत न कोई प्यार की बातन किसी हर्फ़ में महरूमी-ए-जाँ का क़िस्सान किसी लफ़्ज़ में भूले हुए इक़रार की बातन किसी सत्र पे भीगे हुए काजल की लकीरन कहीं ज़िक्र जुदाई का न दीदार की बातबस वही एक ही मज़मूँ कि मिरे शहर के लोगकैसे सहमे हुए रहते हैं घरों में अपनेइतनी बे-नाम ख़मोशी है कि दीवाने भीकोई सौदा नहीं रखते हैं सरों में अपनेअब क़फ़स ही को नशेमन का बदल जान लियाअब कहाँ ताक़त-ए-परवाज़ परों में अपनेवो जो दो चार सुबू-कश थे कि जिन के दम सेगर्दिश-ए-जाम भी थी रौनक़-ए-मय-ख़ाना भी थीवो जो दो चार नवा-गर थे कि जिन के होतेहुर्मत-ए-नग़्मा भी थी जुरअत-ए-रिंदाना भी थीकोई मक़्तल कोई ज़िंदाँ कोई परदेस गयाचंद ही थे कि रविश जिन की जुदागाना भी थीअब तो बस बुर्दा-फ़रोशी है जिधर भी जाओअब तो हर कूचा-ओ-कू मिस्र का बाज़ार लगेसर-ए-दरबार सितादा हैं बयाज़ें ले करवो जो कुछ दोस्त कभी साहब-ए-किरदार लगेग़ैरत-ए-इश्क़ कि कल माल-ए-तिजारत में न थीआज देखो कि हैं अम्बार के अम्बार लगेऐसा आसेब-ज़दा शहर कि देखा न सुनाऐसी दहशत है कि पत्थर हुए सब के बाज़ूदर-ओ-दीवार-ए-ख़राबात वही हैं लेकिनन कहीं क़ुलक़ुल-ए-मीना है न गुल-बाँग-ए-सुबूबे-दिली शेवा-ए-अर्बाब-ए-मुहब्बत ठहराअब कोई आए कि जाए ''तन्नाहू-याहू''
वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगेमर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगेये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगाइस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगामुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न देकाँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न देमुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बनेसीने में दहकते शोले हों हर साँस कोई आज़ार बनेऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेनाग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेनाहो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने काजो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने कालेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहींजो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहींतन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगेसौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगेइंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना हैऔरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैंये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैंवही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापालबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैंवही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुममैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैंख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगींक़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैंशबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगींतमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैंतमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़रसँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैंबहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्यातमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैंतुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुलसब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैंशराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही हैछलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैंख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैंख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैंफ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा हैवो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैंज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शामकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैंवो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनमये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैंये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे हैगुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैंये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुमज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैंफ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई हैसुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैंअब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल परहम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैंये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़ममगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैंज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्लीतिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअनी बना रहे हैंख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत हैये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
रेडियो ने दस बजे शब के ख़बर दी ईद कीआलिमों ने रात भर इस न्यूज़ की तरदीद की
बस यूँही जीते रहोकुछ न कहोसुब्ह जब सो के उठोघर के अफ़राद की गिनती कर लोटाँग पर टाँग रखे रोज़ का अख़बार पढ़ोउस जगह क़हत गिराजंग वहाँ पर बरसीकितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करोरेडियो खोल के फिल्मों के नए गीत सुनोघर से जब निकलो तोशाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लोदोनों हाथों में मुसाफ़े भर लोमुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लोमुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहोकुछ न कहोउजली पोशाकसमाजी इज़्ज़तऔर क्या चाहिए जीने के लिएरोज़ मिल जाती है पीने के लिएबस यूँही जीते रहोकुछ न कहो
नज़र झुकाए उरूस-ए-फ़ितरत जबीं से ज़ुल्फ़ें हटा रही हैसहर का तारा है ज़लज़ले में उफ़ुक़ की लौ थरथरा रही हैरविश रविश नग़्मा-ए-तरब है चमन चमन जश्न-ए-रंग-ओ-बू हैतुयूर शाख़ों पे हैं ग़ज़ल-ख़्वाँ कली कली गुनगुना रही हैसितारा-ए-सुब्ह की रसीली झपकती आँखों में हैं फ़सानेनिगार-ए-महताब की नशीली निगाह जादू जगा रही हैतुयूर बज़्म-ए-सहर के मुतरिब लचकती शाख़ों पे गा रहे हैंनसीम फ़िरदौस की सहेली गुलों को झूला झुला रही हैकली पे बेले की किस अदा से पड़ा है शबनम का एक मोतीनहीं ये हीरे की कील पहने कोई परी मुस्कुरा रही हैसहर को मद्द-ए-नज़र हैं कितनी रिआयतें चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ कीहवा बयाबाँ से आने वाली लहू में सुर्ख़ी बढ़ा रही हैशलूका पहने हुए गुलाबी हर इक सुबुक पंखुड़ी चमन मेंरंगी हुई सुर्ख़ ओढ़नी का हवा में पल्लू सुखा रही हैफ़लक पे इस तरह छुप रहे हैं हिलाल के गिर्द-ओ-पेश तारेकि जैसे कोई नई नवेली जबीं से अफ़्शाँ छुड़ा रही हैखटक ये क्यूँ दिल में हो चली फिर चटकती कलियो? ज़रा ठहरनाहवा-ए-गुलशन की नर्म रो में ये किसी की आवाज़ आ रही है?
रविश-रविश है वही इंतिज़ार का मौसमनहीं है कोई भी मौसम बहार का मौसम
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