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नज़्म
क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
दीप्ति मिश्रा
नज़्म
क़ल्ब-ए-पैवंदी-ए-ग़म तो होगी
शहर में कोई धड़कता हुआ दिल
दिल... की कोई ताज़ा क़लम तो होगी
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
मुनीबुर्रहमान
नज़्म
क्यूँ दाद-ए-ग़म हमीं ने तलब की बुरा किया
हम से जहाँ में कुश्ता-ए-ग़म और क्या न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़ार-ज़ार-ए-ग़म को पैरों से कुचलना है हमें
जादा-ए-मंज़िल में गिरना है सँभलना है हमें
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दानिश फ़राज़ी
नज़्म
पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं
पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली
वहीद अख़्तर
नज़्म
बालमोहन पांडेय
नज़्म
आज भी ख़ार-ज़ार-ए-ग़म ख़ुल्द-ए-बरीं मिरे लिए
आज भी रह-गुज़ार-ए-इश्क़ मेरे लिए है कहकशाँ