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नज़्म
ठुमरी के बोलों में पिन्हाँ अकलापे का बैन
दिन आँखों में कट जाता है कैसे कटे ये रैन
इलियास बाबर आवान
नज़्म
बस्ती छोड़ के जंगल जंगल रैन बसेरा करते हो
या फिर इक पाताल की निचली तह में उतर जा मरते हो
वली आलम शाहीन
नज़्म
है रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा है
हमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना है
जौन एलिया
नज़्म
साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाब
ले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़