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नज़्म
हुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मार
काँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहार
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तेरी महफ़िल को ख़ुदा रक्खे अबद तक क़ाएम
हम तो मेहमाँ हैं घड़ी भर के हमारा क्या है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़ुदारा शुक्र की तल्क़ीन अपने पास ही रक्खें
ये लगती है मिरे सीने पे बन कर तीर मौलाना
हबीब जालिब
नज़्म
मिरे शाने पे सर तक रख दिया है गीत गाए हैं
मिरी दुनिया बदल देती हैं ख़ुश-अल्हानियाँ उस की