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नज़्म
ख़ुद-फ़रेबी में गिरफ़्तार नहीं है 'बिस्मिल'
क्या ये तख़्लीक़ बराए निगह-ए-नाज़ नहीं
बिसमिल देहलवी
नज़्म
सोचता हूँ ये तिरा रक़्स ये सुर-ताल का रंग
शोख़ी-ए-हुस्न भी है 'इश्क़ का ए'जाज़ भी है
बिसमिल आज़मी
नज़्म
फ़िक्र एहसास-ए-तख़य्युल जब गए लफ़्ज़ों में ढल
गुनगुना कर रक़्स फ़रमाने लगी रूह-ए-ग़ज़ल
बिसमिल आज़मी
नज़्म
सूरत-ए-तस्वीर चुप 'बिस्मिल' हुए ये बोल कर
हुस्न की दुनिया है देखो दीदा-ए-दिल खोल कर
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
आ कन्हैय्या कि तिरे वास्ते हम 'बिस्मिल' हैं
कहने सुनने के लिए दिल है मगर बे-दिल हैं
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
मेरी धड़कन की तड़प में रक़्स-ए-बिस्मिल का समाँ है
जैसे दिल पर बेवफ़ाई की छुरी फेरी गई हो
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
रक़्स-ए-मीना से उठे नग़्मा-ए-रक़्स-ए-बिस्मिल
साज़ ख़ुद अपने मुग़न्नी को गुनहगार करें
अहमद फ़राज़
नज़्म
तितलियाँ अपने परों पर पा के क़ाबू हर तरफ़
सेहन-ए-गुलशन की रविश पर रक़्स फ़रमाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
आ 'जमाल'-ए-ज़ार को भी राज़दार-ए-दिल बना
ज़िंदगी इस की भी इक बर्क़-ए-दिल-ए-बिस्मिल बना
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
मुझे नफ़रत नहीं पाज़ेब की झंकार से लेकिन
अभी ताब-ए-नशात-ए-रक़्स-ए-महफ़िल ला नहीं सकता