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नज़्म
मईशत दूसरों के हाथ में है मेरे क़ब्ज़े में
जुज़ इक ज़ेहन-ए-रसा कुछ भी नहीं फिर भी मगर मुझ को
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मेरा इल्हाम तिरा ज़ेहन-ए-रसा भी पत्थर
इस ज़माने में तो हर फ़न का निशाँ पत्थर है
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
हैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा के
उन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे था
नून मीम राशिद
नज़्म
घर से लाया था जो कुछ तब्-ए-रवाँ ज़ेहन-ए-रसा
साथ उस के रहे असबाब-ए-तबाही बन कर
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
बादा है नीम-रस अभी शौक़ है ना-रसा अभी
रहने दो ख़ुम के सर पे तुम ख़िश्त-ए-कलीसिया अभी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सुते से चेहरे पर हयात रसमसाती मुस्कुराती
न जाने कब के आँसुओं की दास्ताँ लिए हुए