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नज़्म
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की क़स्में
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
जो दरवाज़े पे रुक कर देर तक रस्में निभाती थीं
पलंगों पर नफ़ासत से दरी चादर बिछाती थीं
असना बद्र
नज़्म
मिलेंगे हम तो ये दुनिया की रस्में छूट जाएँगी
ये काला आसमाँ कुछ भी नहीं धोका है पल-भर का
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
सिवइयाँ शीर खाने मिलने-जुलने ईद की ख़ुशियाँ मनाने की सभी रस्में अदा की थीं
मगर ये कौन पागल है
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
वही रस्में निभाती हूँ वही दुख दर्द सहती हूँ
मगर मैं अहद-ए-हाज़िर के रवय्यों से भी वाक़िफ़ हूँ
फ़रहत परवीन
नज़्म
मक़ाम-ए-इंस-ओ-‘इरफ़ाँ में रहें आज़ाद हम दोनों
मिसालन नित नई रस्में करें ईजाद हम दोनों