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नज़्म
सदियों पुराने वक़्त की यादें हैं अनमोल-रतन
हर बस्ती थी अम्न की बस्ती हर क़र्ये में सुख
सआदत सय्यद
नज़्म
कभी के तेरी महफ़िल से मोहब्बत के रतन निकले
सितम है इस गुलिस्ताँ से तिरे सब हम-वतन निकले
नारायण दास पूरी
नज़्म
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं