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नज़्म
रोज़-ए-अज़ल से वो भी मुझ तक आने की कोशिश में है
रोज़-ए-अज़ल से मैं भी उस से मिलने की कोशिश में हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
तिरे आग़ोश में बचपन के हम ने दिन बिताए हैं
तिरे आँगन में कितना रोए कितना मुस्कुराए हैं
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा ज़ुल्फ़ों की छाँव में सुख की सेज पे सोए
हबीब जालिब
नज़्म
वो आदमी कि सभी रोए जिन की मय्यत पर
मैं उस को ज़ेर-ए-कफ़न ख़ंदा-ज़न भी देखता हूँ