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नज़्म
करेगी कमरे का रुख़ जब कनीज़-ए-ख़ास हमराह हो
सियाह हो चाहे गोरी हो मगर वो साथ में जाए
इब्न-ए-मुफ़्ती
नज़्म
तबस्सुम काश्मीरी
नज़्म
मुहीब-ओ-सर्व-ओ-सियह हाथ बढ़ते जाते हैं
खिंचे हुए हैं फ़ज़ाओं में आतिशीं ख़ंजर
मुसव्विर सब्ज़वारी
नज़्म
लेकिन किसी में पहचान की झलक तक नहीं है
हर एक बंद मुट्ठी में पुर्ज़ा-हा-ए-सियाह थामे
अज़ीज़ तमन्नाई
नज़्म
अँधेरी रात ने
देखा न कुछ सुनना ही चाहा उस के गोश-ए-नाज़ुक और चश्म-ए-सियह मासूम होते हैं
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
टूट कर चाँद गिरा ग़ार-ए-सियह में आँखें
बुझ गईं महफ़िल-ए-अंजुम की सुबुक-रौ शमएँ